भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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प्राक्कथन (ग) क्या कारण है कि आप समझ नहीं पाते? बाल की खाल निकालकर रटने पर भी क्यों वाक्य-विन्यास ही आपके हाथ लगता है? आप अपने को यथार्थ जानकारी से शून्य ही क्यों पाते हैं? वस्तुतः मनुष्य जन्म लेकर क्रमशः बड़ा होता है तो पैतृक सम्पत्ति (घर, दूकान, जमीन-जायदाद, पद-प्रतिष्ठा, गाय, भैंस, यन्त्र-उपकरण इत्यादि) उसे विरासत में मिलती है। ठीक इसी प्रकार उसे कुछ रूढ़ियाँ, परम्पराएँ, पूजा-पद्धतियाँ भी विरासत में मिल जाती हैं। तैंतीस करोड़ देवी-देवता तो भारत में बहुत पहले गिने गये थे, विश्व में उनके अनगिनत रूप हैं। शिशु ज्यों-ज्यों बड़ा होता है, अपने माता-पिता, भाई-बहन, पास-पड़ोस में इनकी पूजा देखता है। परिवार में प्रचलित पूजा- पद्धतियों की अमिट छाप उसके मस्तिष्क पर पड़ जाती है। देवी की पूजा मिली तो जीवनभर देवी-देवी रटता है, परिवार में भूत-पूजा मिली तो भूत- भूत रटता है। कोई शिव तो कोई कृष्ण, तो कोई कुछ पकड़े ही रहता है। उन्हें वह छोड़ नहीं सकता। ऐसे भ्रान्तपुरुष को गीता-जैसा कल्याणकारी शास्त्र मिल भी जाय तो वह उसे नहीं समझ सकता। पैतृक सम्पदा को कदाचित् वह छोड़ भी सकता है; किन्तु इन रूढ़ियों और मज़हबी पचड़ों को नहीं मिटा सकता। पैतृक सम्पत्ति को हटाकर आप हजारों मील दूर जा सकते हैं; किन्तु दिल-दिमाग में अंकित ये रूढ़िगत विचार वहाँ भी आपका पिण्ड नहीं छोड़ते। आप सिर काटकर अलग तो रख नहीं सकते। अतः आप यथार्थ शास्त्र को भी उन्हीं रूढ़ियों, रीति-रिवाजों, मान्यताओं और पूजा-पद्धतियों के अनुरूप ढालकर देखना चाहते हैं। यदि उनके अनुरूप बात ढलती है, वार्त्ता का क्रम बैठता है तो आप उसे सही मानते हैं और नहीं ढलती तो गलत मानते हैं। इसीलिये आप गीता का रहस्य नहीं देख पाते। गीता का रहस्य, रहस्य ही बनकर रह जाता है। इसके वास्तविक पारखी सन्त अथवा सद्गुरु हैं। वही बता सकते हैं कि गीता क्या कहती है? सब नहीं जान सकते। सबके लिये सुलभ उपाय यही है कि इसे किसी महापुरुष के सान्निध्य में समझें, जिसके लिये श्रीकृष्ण ने बल दिया है। गीता किसी विशिष्ट व्यक्ति, जाति, वर्ग, पंथ, देश-काल या किसी रूढ़िग्रस्त सम्प्रदाय का ग्रन्थ नहीं है, बल्कि यह सार्वलौकिक, सार्वकालिक