यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(ख) श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता उसी अवस्था को प्राप्त महापुरुष ही जानता है कि गीता क्या कहती है। वह गीता की पंक्तियाँ ही नहीं दुहराता, बल्कि उनके भावों को भी दर्शा देता है; क्योंकि जो दृश्य श्रीकृष्ण के सामने था, वही उस वर्तमान महापुरुष के समक्ष भी है। इसलिये वह देखता है, दिखा देगा; आपमें जागृत भी कर देगा, उस पथ पर चला भी देगा। 'पूज्य श्री परमहंस जी महाराज' भी उसी स्तर के महापुरुष थे। उनकी वाणी तथा अन्तःप्रेरणा से मुझे गीता का जो अर्थ मिला, उसी का संकलन 'यथार्थ गीता' है। इसमें मेरा अपना कुछ भी नहीं है। यह 'क्रियात्मक' है। साधन अपनानेवाले प्रत्येक पुरुष को इसी परिधि से गुजरना होगा। जब तक वह इससे अलग है, तब तक स्पष्ट है कि वह साधन नहीं करता, किसी-न- किसी प्रकार की लकीर अवश्य पीटता है। अतः किसी महापुरुष की शरण लें। श्रीकृष्ण ने किसी अन्य सत्य को नहीं बताया, बल्कि कहा- ‘ऋषिभिर्बहुधा गीतम्'- ऋषियों ने अनेकों बार जिसका गायन किया है, वही कहने जा रहा हूँ। उन्होंने यह नहीं कहा कि उस ज्ञान को केवल मैं ही जानता हूँ या मैं ही बताऊँगा, बल्कि कहा- “किसी 'तत्त्वदर्शी' के पास जाओ। निष्कपट भाव से सेवा करके उस ज्ञान को प्राप्त करो।” श्रीकृष्ण ने महापुरुषों द्वारा शोधित सत्य को ही उद्घाटित किया है। गीता सुबोध संस्कृत में है। यदि अन्वयार्थ ही लें तो गीता का अधिकांश आप स्वयं हृदयंगम कर सकेंगे; किन्तु आप ज्यों-का-त्यों अर्थ नहीं लेते। उदाहरण के लिये; श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा कि “यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है।”, फिर भी आप कहते हैं कि खेती करना कर्म है। यज्ञ को स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया कि यज्ञ में बहुत से योगीजन प्राण में अपान को हवन करते हैं, बहुत से अपान में प्राण को हवन करते हैं, बहुत से योगी प्राण-अपान दोनों को रोककर प्राणायामपरायण हो जाते हैं। बहुत से योगी इन्द्रियों की सम्पूर्ण प्रवृत्तियों को संयमाग्नि में हवन करते हैं। इस प्रकार श्वास-प्रश्वास का चिन्तन यज्ञ है, मनसहित इन्द्रियों का संयम यज्ञ है। शास्त्रकार ने स्वयं यज्ञ बताया, फिर भी आप कहते हैं कि विष्णु के निमित्त स्वाहा बोलना, अग्नि में जौ-तिल- घी का हवन करना यज्ञ है। उन योगेश्वर ने ऐसा एक शब्द भी नहीं कहा।