भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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प्राक्कथन वस्तुतः गीता पर टीका लिखने की अब कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती; क्योंकि इस पर सहस्रों टीकाएँ लिखी जा चुकी हैं, जिनमें पचासों तो केवल संस्कृत में ही हैं। गीता को लेकर पचासों मत हैं, जबकि सबकी आधारशिला एकमात्र गीता है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने तो कोई एक बात कही होगी, फिर यह मतभेद क्यों? वस्तुतः वक्ता एक ही बात कहता है; किन्तु श्रोता यदि दस बैठे हों तो दस प्रकार के आशय ग्रहण करते हैं। व्यक्ति की बुद्धि पर तामसी, राजसी अथवा सात्त्विक गुणों का जितना प्रभाव है, उसी स्तर से उस वार्त्ता को पकड़ पाता है। इससे आगे वह समझ नहीं पाता। अतः मतभेद स्वाभाविक है। विभिन्न मतवादों से, और कभी-कभी एक ही सिद्धान्त को अलग- अलग काल और भाषाओं में व्यक्त करने से साधारण मनुष्य संशय में पड़ जाता है। बहुत-सी टीकाओं के बीच वह सत्यधारा भी प्रवाहित है; किन्तु शुद्ध अर्थवाली एक टीका हजारों टीकाओं के बीच रख दी जाय तो उनमें यह पहचानना कठिन हो जाता है कि यथार्थ कौन है? वर्तमानकाल में गीता की बहुत-सी टीकाएँ हो गयी हैं, सभी अपनी-अपनी सत्यता का उद्घोष करती हैं; किन्तु गीता के शुद्ध अर्थ से वे बहुत दूर हैं। निःसन्देह कुछ महापुरुषों ने सत्य का स्पर्श भी किया; किन्तु कतिपय कारणों से वे उसे समाज के समक्ष प्रस्तुत न कर सके। श्रीकृष्ण के आशय को हृदयंगम न कर पाने का मूल कारण है कि वे एक योगी थे। श्रीकृष्ण जिस स्तर की बात करते हैं, क्रमशः चलकर उसी स्तर पर खड़ा होनेवाला कोई महापुरुष ही अक्षरशः बता सकेगा कि श्रीकृष्ण ने जिस समय गीता का उपदेश दिया था, उस समय उनके मनोगत भाव क्या थे? मनोगत समस्त भाव कहने में नहीं आते। कुछ तो कहने में आ पाते हैं, कुछ भाव-भंगिमा से व्यक्त होते हैं और शेष पर्याप्त क्रियात्मक हैं, जिन्हें कोई पथिक चलकर ही जान सकता है। जिस स्तर पर श्रीकृष्ण थे, क्रमशः चलकर