यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकादश अध्याय २५१ मैं आपको वैसे ही अर्थात् पहले की ही तरह शिर पर मुकुट धारण किये हुए, हाथ में गदा और चक्र लिये हुए देखना चाहता हूँ। इसलिये हे विश्वरूपे ! हे सहस्रबाहो ! आप अपने उसी चतुर्भुज स्वरूप में होइए। कौन-सा रूप देखना चाहा? चतुर्भुज रूप ! अब देखना है कि चतुर्भुज रूप है क्या?- श्रीभगवानुवाच मया प्रसन्नेन तवार्जुनेंदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्। तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्।।४७।। इस प्रकार अर्जुन की प्रार्थना सुनकर श्रीकृष्ण बोले-अर्जुन! मैंने अनुग्रहपूर्वक अपनी योगशक्ति के प्रभाव से अपना परम तेजोमय, सबका आदि और सीमारहित विश्वरूप तुझे दिखाया है, जिसे तेरे सिवाय दूसरे किसी ने पहले कभी नहीं देखा। न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै- र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः। एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर।।४८।। अर्जुन! इस मनुष्यलोक में इस प्रकार विश्वरूपवाला मैं न वेद से, न यज्ञ से, न अध्ययन से, न दान से, न क्रिया से, न उग्र तप से और न तेरे सिवाय किसी अन्य से देखा जाने को सम्भव हूँ अर्थात् तेरे सिवाय यह रूप अन्य कोई देख नहीं सकता। तब तो गीता आपके लिये बेकार है। भगवद्दर्शन की भी योग्यताएँ अर्जुन तक सीमित रह गयीं, जबकि पीछे बता आये हैं कि- अर्जुन! राग, भय और क्रोध से रहित अनन्य मन से मेरी शरण हुए बहुत से लोग ज्ञानरूपी तप से पवित्र होकर साक्षात् मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं। यहाँ कहते हैं- तेरे सिवाय न कोई देख सका है और न भविष्य में कोई देख सकेगा। अतः अर्जुन कौन है? क्या कोई पिण्डधारी है? क्या कोई शरीरधारी है? नहीं,