यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता वस्तुतः अनुराग ही अर्जुन है। अनुरागविहीन पुरुष न कभी देख सका है और न भविष्य में कभी देख सकेगा। सब ओर से चित्त समेटकर एकमात्र इष्ट के अनुरूप राग ही अनुराग है। अनुरागी के लिये ही प्राप्ति का विधान है। मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्। व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य।।४९।। इस प्रकार के मेरे इस विकराल रूप को देखकर तुझे व्याकुलता न हो और मूढ़भाव भी न हो कि घबड़ाकर अलग हो जाओ। अब तू भयरहित और प्रीतियुक्त मन से उसी मेरे इस रूप को अर्थात् चतुर्भुज रूप को फिर देख। सञ्जय उवाच इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः। आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा।।५०।। संजय बोला- सर्वत्र वास करनेवाले देव उन वासुदेव ने अर्जुन से इस प्रकार कहकर फिर वैसे ही अपने रूप को दिखाया। फिर महात्मा श्रीकृष्ण ने 'सौम्यवपुः' अर्थात् प्रसन्न होकर भयभीत अर्जुन को धैर्य दिया। अर्जुन बोला- अर्जुन उवाच दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन। इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः।।५१।। जनार्दन! आपके इस अत्यन्त शान्त मनुष्य रूप को देखकर अब मैं प्रसन्नचित्त हुआ अपने स्वभाव को प्राप्त हो गया हूँ। अर्जुन ने कहा था, भगवन्! अब आप मुझे उसी चतुर्भुज स्वरूप का दर्शन कराइये। योगेश्वर ने