यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्राक्कथन (छ) ६. युद्ध-स्थान- यह मानव-शरीर और मनसहित इन्द्रियों का समूह 'युद्धस्थल' है। ७. ज्ञान- परमात्मा की प्रत्यक्ष जानकारी 'ज्ञान' है। ८. योग- संसार के संयोग-वियोग से रहित अव्यक्त ब्रह्म के मिलन का नाम 'योग' है। ९. ज्ञानयोग- आराधना ही कर्म है। अपने पर निर्भर होकर कर्म में प्रवृत्त होना 'ज्ञानयोग' है। १०. निष्काम कर्मयोग- इष्ट पर निर्भर होकर समर्पण के साथ कर्म में प्रवृत्त होना 'निष्काम कर्मयोग' है। ११. श्रीकृष्ण ने किस सत्य को बताया?- श्रीकृष्ण ने उसी सत्य को बताया, जिसको तत्त्वदर्शियों ने पहले देख लिया था और आगे भी देखेंगे। १२. यज्ञ- साधना की विधि-विशेष का नाम 'यज्ञ' है। १३. कर्म- यज्ञ को कार्यरूप देना ही 'कर्म' है। १४. वर्ण- आराधना की एक ही विधि, जिसका नाम कर्म है। जिसको चार श्रेणियों में बाँटा है, वही चार वर्ण हैं। यह एक ही साधक का ऊँचा- नीचा स्तर है, न कि जाति। १५. वर्णसंकर- परमात्म-पथ से च्युत होना, साधन में भ्रम उत्पन्न हो जाना 'वर्णसंकर' है। १६. मनुष्य की श्रेणी- अन्तःकरण के स्वभाव के अनुसार मनुष्य दो प्रकार का होता है- एक देवताओं-जैसा, दूसरा असुरों-जैसा। यही मनुष्य की दो जातियाँ हैं, जो स्वभाव द्वारा निर्धारित हैं और यह स्वभाव घटता- बढ़ता रहता है। १७. देवता- हृदय-देश में परमदेव का देवत्व अर्जित करानेवाले गुणों का समूह है। बाह्य देवताओं की पूजा मूढ़बुद्धि की देन है।