यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(ज) श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता १८. अवतार- व्यक्ति के हृदय में होता है, बाहर नहीं। १९. विराट् दर्शन- योगी के हृदय में ईश्वर के द्वारा दी गयी अनुभूति है। भगवान साधक में दृष्टि बनकर खड़े हों, तभी दिखायी पड़ते हैं। २०. पूजनीय देव ‘इष्ट’- एकमात्र परात्पर ब्रह्म ही ‘पूजनीय देव’ है। उसे खोजने का स्थान हृदय-देश है। उसकी प्राप्ति का स्रोत उसी अव्यक्त स्वरूप में स्थित ‘प्राप्तिवाले महापुरुष’ के द्वारा है। अब इनमें से योगेश्वर श्रीकृष्ण का स्वरूप समझने के लिये अध्याय तीन तक आपको पढ़ना होगा, और अध्याय तेरह तक आप स्पष्ट समझने लगेंगे कि श्रीकृष्ण योगी थे। अध्याय दो से ही सत्य निखर जायेगा। सनातन और सत्य एक दूसरे के पूरक हैं, यह अध्याय दो से ही स्पष्ट होगा, वैसे पूर्तिपर्यन्त चलेगा। युद्ध अध्याय चार तक स्पष्ट होने लगेगा, ग्यारह तक संशय निर्मूल हो जायेगा; वैसे अध्याय सोलह तक देखना चाहिये। ‘युद्धस्थल’ के लिए अध्याय तेरह बार- बार देखें। ‘ज्ञान’ अध्याय चार से स्पष्ट होगा तथा अध्याय तेरह में भली प्रकार समझ में आयेगा कि प्रत्यक्ष दर्शन का नाम ‘ज्ञान’ है। ‘योग’ अध्याय छः तक आप समझ सकेंगे, वैसे पूर्तिपर्यन्त योग के विभिन्न अंशों की परिभाषा है। ‘ज्ञानयोग’ अध्याय तीन से छः तक स्पष्ट हो जायेगा, आगे देखने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। ‘निष्काम कर्मयोग’ अध्याय दो से आरम्भ होकर पूर्तिपर्यन्त है। ‘यज्ञ’ आप अध्याय तीन से चार तक पढ़ें, स्पष्ट हो जायेगा। ‘कर्म’ का नाम अध्याय २/३९ में प्रथम बार लिया गया है। इसी श्लोक से अध्याय चार तक पढ़ लें तो स्पष्ट हो जायेगा कि कर्म का अर्थ आराधना, भजन क्यों है? अध्याय सोलह और सत्रह यह विचार स्थिर कर देता है कि यही सत्य है। ‘वर्णसंकर’ अध्याय तीन में और ‘अवतार’ अध्याय चार में स्पष्ट हो जायेगा। ‘वर्ण-व्यवस्था’ के लिये अध्याय अठारह देखना होगा, वैसे संकेत अध्याय तीन और चार में भी है। मनुष्य की देवासुर जातियों के लिये अध्याय सोलह द्रष्टव्य है। ‘विराट् दर्शन’ अध्याय दस से ग्यारह तक स्पष्ट हो गया है। अध्याय सात, नौ और पन्द्रह में भी इस पर प्रकाश डाला गया है। अध्याय