भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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एकादश अध्याय २५५ तक नहीं करेगा, जो संगदोष से अलग रहेगा तो युद्ध कैसा? जब आपके साथ कोई है ही नहीं तो आप युद्ध किससे करेंगे? सम्पूर्ण भूतप्राणियों में जो बैरभाव से रहित है, मन से भी किसी को सताने की कल्पना न करे, वही मुझे प्राप्त होता है-तो क्या अर्जुन ने लड़ाई ली? कभी नहीं। वस्तुतः संगदोष से अलग रहकर जब आप अनन्य चिन्तन में लगते हैं, निर्धारित यज्ञ की क्रिया में प्रवृत्त होते हैं, उस समय परिपंथी राग-द्वेष, काम-क्रोध इत्यादि दुर्जय शत्रु बाधा के रूप में प्रत्यक्ष ही हैं। उनका पार पाना ही युद्ध है। निष्कर्ष- इस अध्याय के आरम्भ में अर्जुन ने कहा-भगवन्! आपकी विभूतियों को मैंने विस्तार से सुना, जिससे मेरा मोह नष्ट हो गया, अज्ञान का शमन हो गया; किन्तु जैसा आपने बताया कि मैं सर्वत्र हूँ, इसे मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ। यदि मेरे द्वारा देखना सम्भव हो, तो कृपया उसी स्वरूप को दिखाइये। अर्जुन प्रिय सखा था, अनन्य सेवक था। अतएव योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कोई प्रतिवाद न कर तुरन्त दिखाना प्रारम्भ किया कि अब मेरे ही अन्दर खड़े सप्तर्षि और उनसे भी पूर्व होनेवाले ऋषियों को देख, ब्रह्मा और विष्णु को देख, सर्वत्र फैले मेरे तेज को देख, मेरे ही शरीर में एक स्थान पर खड़े तू चराचर जगत् को देख; किन्तु अर्जुन आँखें मलता ही रह गया। इसी प्रकार योगेश्वर श्रीकृष्ण तीन श्लोकों तक अनवरत दिखाते गये; किन्तु अर्जुन को कुछ भी दिखायी नहीं पड़ा। सभी विभूतियाँ योगेश्वर में उस समय थीं; किन्तु अर्जुन को वे सामान्य मनुष्य-जैसे ही दिखायी पड़ रहे थे। तब इस प्रकार दिखाते-दिखाते योगेश्वर श्रीकृष्ण सहसा रुक जाते हैं और कहते हैं- अर्जुन! इन आँखों से तू मुझे नहीं देख सकता। अपनी बुद्धि से तू मुझे परख नहीं सकता। लो, अब मैं तुझे वह दृष्टि देता हूँ, जिससे तू मुझे देख सकेगा। भगवान तो सामने खड़े ही थे। अर्जुन ने देखा, वास्तव में देखा। देखने के पश्चात् क्षुद्र त्रुटियों के लिए क्षमायाचना करने लगा, जो वास्तव में त्रुटियाँ नहीं थीं।