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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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२५६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता उदाहरण के लिये; भगवन्! कभी मैंने आपको कृष्ण, यादव और कभी सखा कह दिया था, इसके लिये आप मुझे क्षमा करें। श्रीकृष्ण ने क्षमा भी किया; क्योंकि अर्जुन की प्रार्थना स्वीकार कर वे सौम्य स्वरूप में आ गये, धीरज बँधाया। वस्तुतः कृष्ण कहना अपराध नहीं था। वे साँवले थे ही, गोरे कैसे कहलाते। यदुवंश में जन्म हुआ ही था। श्रीकृष्ण स्वयं भी अपने को सखा मानते ही थे। वास्तव में प्रत्येक साधक महापुरुष को पहले ऐसा ही समझते हैं। कुछ उन्हें रूप और आकार से सम्बोधित करते हैं, कुछ उनकी वृत्ति से उन्हें पुकारते हैं और कुछ उन्हें अपने ही समकक्ष मानते हैं, उनके यथार्थ स्वरूप को नहीं समझते। उनके अचिन्त्य स्वरूप को अर्जुन ने समझा तो पाया कि ये न तो काले हैं और न गोरे, न किसी कुल के हैं और न किसी के साथी ही हैं। इनके समान कोई है ही नहीं, तो सखा कैसा? बराबर कैसा? यह तो अचिन्त्य स्वरूप हैं। जिसे यह स्वयं दिखा दें, वही इन्हें देख पाता है। अतः अर्जुन ने अपनी प्रारम्भिक भूलों के लिये क्षमायाचना की। प्रश्न उठता है कि जब कृष्ण कहना अपराध है, तो उनका नाम जपा कैसे जाय? तो जिसे योगेश्वर श्रीकृष्ण ने जपने के लिये स्वयं बल दिया, जपने की जो विधि बतायी, उसी विधि से आप चिन्तन-स्मरण करें। वह है- ‘ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।’- ‘ओम्’ अक्षय ब्रह्म का पर्याय है। ‘ओ अहम् स ओम्’- जो व्याप्त है वह सत्ता मुझमें छिपी है, यही है ओम् का आशय। आप इसका जप करें और ध्यान मेरा करें। रूप अपना, नाम ओम् का बताया। अर्जुन ने प्रार्थना की कि चतुर्भुज रूप में दर्शन दीजिये। श्रीकृष्ण ने उसी सौम्य स्वरूप को धारण किया। अर्जुन ने कहा- भगवन्! आपके इस सौम्य मानव स्वरूप को देखकर अब मैं प्रकृतिस्थ हुआ। माँगा था चतुर्भुज रूप, दिखाया ‘मानुषं रूपं’। वास्तव में शाश्वत में प्रवेशवाला योगी शरीर से यहाँ बैठा है, बाहर दो हाथों से कार्य करता है और साथ ही अन्तरात्मा से जागृत होकर जहाँ से भी जो भाविक स्मरण करते हैं, एक साथ सर्वत्र उनके हृदय से

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