भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

DevanagariHindipublished429 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 429 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 33

प्राक्कथन (ट) परमात्मा में विश्वास और प्रवेश दिलाती है। तत्त्वदर्शी महापुरुष के संरक्षण में क्रमशः साधन करने पर दैवी सम्पद् का उत्कर्ष और आसुरी सम्पद् का सर्वथा शमन हो जाता है। जब कोई विकार ही नहीं रहा, मन का सर्वथा निरोध और निरुद्ध मन का भी विलय हो जाता है तो दैवी सम्पद् की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। अर्जुन ने देखा कि कौरव-पक्ष के अनन्तर पाण्डव-पक्ष के योद्धा भी योगेश्वर में समाहित हो रहे हैं। पूर्ति के साथ दैवी सम्पद् भी विलीन हो जाती है, अन्तिम शाश्वत परिणाम निकल आता है। इसके पश्चात् महापुरुष यदि कुछ करता है तो केवल अनुयायियों के मार्गदर्शन के लिये ही करता है। लोकसंग्रह की इसी भावना से महापुरुषों ने सूक्ष्म मनोभावों का वर्णन उन्हें ठोस स्थूलरूप देकर किया है। 'गीता' छन्दोबद्व है, व्याकरणसम्मत है; किन्तु इसके पात्र प्रतीकात्मक हैं, अमूर्त योग्यताओं के मूर्तरूप मात्र हैं। गीता के आरम्भ में तीस-चालीस पात्रों का नाम लिया गया है जिनमें आधे सजातीय हैं, आधे विजातीय; कुछ पाण्डव-पक्ष के हैं, कुछ कौरव-पक्ष के। 'विश्वरूप दर्शन' के समय इनमें से चार-छः नाम पुनः आये हैं, अन्यथा सम्पूर्ण गीता में इन नामों की चर्चा तक नहीं है। एकमात्र अर्जुन ही ऐसा पात्र है, जो आरम्भ से अन्त तक योगेश्वर के समक्ष है। वह अर्जुन भी केवल योग्यता का प्रतीक है, न कि व्यक्ति-विशेष। गीता के आरम्भ में अर्जुन सनातन कुलधर्म के लिए विकल है; किन्तु योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इसे अज्ञान बताया और निर्देश दिया कि आत्मा ही सनातन है, शरीर नाशवान् है, इसलिये युद्ध कर। इस आदेश से यह स्पष्ट नहीं होता कि अर्जुन कौरवों को ही मारे। पाण्डव-पक्ष के भी शरीरधारी ही तो थे, दोनों ओर सम्बन्धी ही तो थे। संस्कारों पर आधारित शरीर क्या तलवार से काटने पर समाप्त हो सकेगा? जब शरीर नाशवान् है, जिसका अस्तित्व है ही नहीं, तो अर्जुन कौन था? श्रीकृष्ण किसकी रक्षा में खड़े थे? क्या किसी शरीरधारी की रक्षा में खड़े थे? श्रीकृष्ण ने कहा, "जो शरीर के लिये परिश्रम करता है, वह पापायु मूढ़बुद्धि पुरुष व्यर्थ ही जीता है।" यदि श्रीकृष्ण किसी शरीरधारी की रक्षा में खड़े हैं, तब तो वे भी मूढ़बुद्धि हैं, व्यर्थ ही जीनेवाले हैं। वस्तुतः अनुराग ही अर्जुन है।