यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(ठ) श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता अनुरागी के लिये महापुरुष सदैव खड़े हैं। अर्जुन शिष्य था और श्रीकृष्ण एक सद्गुरु थे। विनयावनत होकर उसने कहा- धर्म के मार्ग में मोहितचित्त मैं आपसे पूछता हूँ, जो श्रेय (परम कल्याणकारी) हो, वह उपदेश मेरे प्रति कहिये। अर्जुन श्रेय चाहता था, प्रेय (भौतिक पदार्थ) नहीं। केवल कहिये ही नहीं, साधिये-सँभालिये। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में हूँ। इसी प्रकार गीता में स्थान-स्थान पर स्पष्ट है कि अर्जुन आर्त अधिकारी है और योगेश्वर श्रीकृष्ण एक सद्गुरु हैं। वे सद्गुरु अनुरागी के साथ सदैव रहते हैं, उनका मार्गदर्शन करते हैं। जब भावुकतावश कोई व्यक्ति 'पूज्य महाराज जी' के पास रहने का आग्रह करने लगता था, तब वे कहा करते थे- "जाओ, शरीर से कहीं रहो, मन से मेरे पास आते रहो। प्रातः-सायं राम, शिव, ॐ किसी एक दो-ढाई अक्षर के नाम का जाप करो और मेरे स्वरूप का हृदय में ध्यान धरो। एक मिनट भी स्वरूप पकड़ लोगे तो जिसका नाम भजन है वह मैं तुम्हें दूँगा। इससे अधिक पकड़ने लगोगे तो हृदय से रथी बनकर सदैव तुम्हारे साथ रहूँगा।" जब सुरत पकड़ में आ जाती है तो इसके बाद महापुरुष इतना ही पास में रहते हैं जितना हाथ-पाँव, नाक-कान इत्यादि आपके पास हैं। आप हजारों किलोमीटर दूर क्यों न हों, वह सदैव समीप हैं। मन में विचारों के उठने से भी पहले वे मार्गदर्शन करने लग जाते हैं। अनुरागी के हृदय में वह महापुरुष सदैव आत्मा से अभिन्न होकर जाग्रत रहते हैं। अर्जुन अनुराग का प्रतीक है। गीता के ग्यारहवें अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण का ऐश्वर्य देखने पर अर्जुन अपनी क्षुद्र त्रुटियों के लिये क्षमायाचना करने लगा। श्रीकृष्ण ने क्षमा किया और याचना के अनुरूप सौम्य स्वरूप में आकर कहा, "अर्जुन! मेरे इस स्वरूप को न पहले किसी ने देखा है और न भविष्य में कोई देख सकेगा।" तब तो गीता हमलोगों के लिए व्यर्थ है; क्योंकि उस दर्शन की योग्यताएँ अर्जुन तक सीमित रह गयीं, जबकि उसी समय संजय देख रहा था। पहले भी उन्होंने कहा, "बहुत से योगीजन ज्ञानरूपी तप से पवित्र होकर मेरे साक्षात् स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।" अन्ततः वे महापुरुष कहना क्या चाहते हैं? वस्तुतः अनुराग