भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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षोडश अध्याय ३१५ परमपद की प्राप्ति के लिये है और आसुरी सम्पद् बन्धन और अधोगति के लिये है। अर्जुन! तू शोक न कर; क्योंकि तू दैवी सम्पद् को प्राप्त हुआ है। ये सम्पदाएँ होती कहाँ हैं? उन्होंने बताया कि इस लोक में मनुष्यों के स्वभाव दो प्रकार के होते हैं- देवताओं-जैसा और असुरों-जैसा। जब दैवी सम्पद् का बाहुल्य होता है तो मनुष्य देवताओं-जैसा होता है और जब आसुरी सम्पद् का बाहुल्य होता है तो मनुष्य असुरों-जैसा है। सृष्टि में बस मनुष्यों की दो ही जाति हैं; चाहे वह कहीं पैदा हुआ हो, कुछ भी कहलाता हो। तत्पश्चात् उन्होंने आसुरी स्वभाववाले मनुष्यों के लक्षणों का विस्तार से उल्लेख किया। आसुरी सम्पद् को प्राप्त पुरुष कर्तव्य कर्म में प्रवृत्त होना नहीं जानता और अकर्तव्य कर्म से निवृत्त होना नहीं जानता। वह कर्म में जब प्रवृत्त ही नहीं हुआ तो न उसमें सत्य होता है, न शुद्धि और न आचरण ही होता है। उसके विचार में जगत् आश्रयरहित, बिना ईश्वर के अपने आप स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न हुआ है, अतः केवल भोग भोगने के लिये है। इससे आगे क्या है?- यह विचार कृष्णकाल में भी था। सदैव रहा है। केवल चार्वाक ने कहा हो, ऐसी बात नहीं है। जब तक जनमानस में दैवी-आसुरी सम्पद् का उतार-चढ़ाव है तब तक रहेगा। श्रीकृष्ण कहते हैं- वे मन्दबुद्धिवाले पुरुष सबका अहित (कल्याण का नाश) करने के लिये ही जगत् में पैदा होते हैं। वे कहते हैं- मेरे द्वारा यह शत्रु मारा गया, उसे मारूँगा। इस प्रकार अर्जुन ! काम- क्रोध के आश्रित वे पुरुष शत्रुओं को नहीं मारते बल्कि अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ परमात्मा से द्वेष करनेवाले हैं। तो क्या अर्जुन ने प्रण करके जयद्रथादि को मारा? यदि मारता है तो आसुरी सम्पद्वाला है, उन परमात्मा से द्वेष करनेवाला है; जबकि अर्जुन को श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा कि तू दैवी सम्पद् को प्राप्त हुआ है, शोक मत कर। यहाँ भी स्पष्ट हुआ कि ईश्वर का निवास सबके हृदय-देश में है। स्मरण रखना चाहिये कि कोई तुम्हें सतत देख रहा है। अतः सदैव शास्त्रनिर्दिष्ट क्रिया का ही आचरण करना चाहिये अन्यथा दण्ड प्रस्तुत है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने पुनः कहा कि आसुरी स्वभाववाले क्रूर मनुष्यों को मैं बारम्बार नरक में गिराता हूँ। नरक का स्वरूप क्या है? तो बताया, बारम्बार