यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३१६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता नीच-अधम योनियों में गिरना एक दूसरे का पर्याय है। यही नरक का स्वरूप है। काम, क्रोध और लोभ नरक के तीन मूल द्वार हैं। इन तीनों पर ही आसुरी सम्पद् टिकी हुई है। इन तीनों को त्याग देने पर ही उस कर्म का आरम्भ होता है, जिसे मैंने बार-बार बताया है। सिद्ध है कि कर्म कोई ऐसी वस्तु है, जिसका आरम्भ काम, क्रोध और लोभ को त्याग देने पर ही होता है। सांसारिक कार्यों में, मर्यादित ढंग से सामाजिक व्यवस्थाओं का निर्वाह करने में भी जो जितने व्यस्त हैं काम, क्रोध और लोभ उनके पास उतने अधिक सजे-सजाये मिलते हैं। वस्तुतः इन तीनों को त्याग देने पर ही परम में प्रवेश दिलानेवाले निर्धारित कर्म में प्रवेश मिलता है। इसलिये मैं क्या करूँ, क्या न करूँ? - इस कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। कौन-सा शास्त्र? यही गीताशास्त्र; 'किमन्यै शास्त्रविस्तरैः।' इसलिये इस शास्त्र द्वारा निर्धारित किये हुए कर्म-विशेष (यज्ञार्थ कर्म) को ही तू कर। इस अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने दैवी और आसुरी दोनों सम्पदाओं का विस्तार से वर्णन किया। उनका स्थान मानव-हृदय बताया। उनका फल बताया। अतः- ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे 'दैवासुरसम्पद्विभागयोगो' नाम षोडशोऽध्यायः॥१६॥ इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के सम्वाद में 'दैवासुर सम्पद् विभाग योग' नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण होता है। इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते श्रीमद्भगवद्गीतायाः 'यथार्थ गीता' भाष्ये 'दैवासुरसम्पद्विभागयोगो' नाम षोडशोऽध्यायः॥१६॥ इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत 'श्रीमद्भगवद्गीता' के भाष्य 'यथार्थ गीता' में 'दैवासुर सम्पद् विभाग योग' नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण होता है। ।। हरिः ॐ तत्सत् ।।