भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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पृष्ठ 370

अष्टादश अध्याय ३३५ जाता है। अतः जब तक शरीर के कारण जीवित हैं, तब तक नियत कर्म करें और उसके फल का त्याग करें। बदले में किसी फल की कामना न करें। वैसे सकामी पुरुषों के कर्मों का फल भी होता है- अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्। भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित्।।१२।। सकामी पुरुषों के कर्मों का अच्छा, बुरा और मिला हुआ- ऐसा तीन प्रकार का फल मरने का पश्चात् भी होता है, जन्म-जन्मान्तरों तक मिलता है; किन्तु 'सन्न्यासिनाम्'- सर्वस्व का न्यास (अन्त) करनेवाले पूर्ण त्यागी पुरुषों के कर्मों का फल किसी भी काल में नहीं होता। यही शुद्ध संन्यास है। संन्यास चरमोत्कृष्ट अवस्था है। भले-बुरे कर्मों का फल तथा पूर्ण न्यासकाल में उनके अन्त का प्रश्न पूरा हुआ। अब पुरुष के द्वारा शुभ अथवा अशुभ कर्म होने में क्या कारण हैं? इस पर देखें- पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे। साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्।।१३।। हे महाबाहो! सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि के लिये पाँच कारण सांख्य- सिद्धान्त में कहे गये हैं, उन्हें तू मुझसे भली प्रकार जान। अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्।।१४।। इस विषय में कर्त्ता (यह मन), पृथक्-पृथक् करण (जिनके द्वारा किया जाता है। यदि शुभ पार लगता है तो विवेक, वैराग्य, शम, दम, त्याग, अनवरत चिन्तन की प्रवृत्तियाँ इत्यादि करण होंगी। यदि अशुभ पार लगता है तो काम, क्रोध, राग, द्वेष, लिप्सा इत्यादि करण होंगे। इनके द्वारा प्रेरित होंगे।), नाना प्रकार की न्यारी-न्यारी चेष्टाएँ (अनन्त इच्छाएँ), आधार अर्थात् साधन (जिस इच्छा के साथ साधन मिला वही इच्छा पूरी होने लगती है।) और पाँचवाँ हेतु है दैव अथवा संस्कार। इसकी पुष्टि करते हैं- शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः। न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः।।१५।।