भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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३३६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता मनुष्य मन, वाणी और शरीर से शास्त्र के अनुसार अथवा विपरीत जो कुछ कर्म आरम्भ करता है, उसके ये पाँचों ही कारण हैं। परन्तु ऐसा होने पर भी- तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः। पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥१६॥ जो पुरुष अशुद्ध बुद्धि के कारण उस विषय में कैवल्यस्वरूप आत्मा को कर्त्ता देखता है, वह दुर्बुद्धि यथार्थ नहीं देखता अर्थात् भगवान् नहीं करते। इस प्रश्न पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने दूसरी बार बल दिया। अध्याय ५ में उन्होंने कहा कि वह प्रभु न करता है, न कराता है, न क्रिया के संयोग को जोड़ता है। तो लोग कहते क्यों हैं? मोह से लोगों की बुद्धि आवृत्त है, इसलिये कुछ भी कह सकते हैं। यहाँ भी कहते हैं- कर्म होने में पाँच कारण हैं। उसके बावजूद भी जो कैवल्य स्वरूप परमात्मा को कर्त्ता देखता है, वह मूढ़बुद्धि (दुर्बुद्धि) यथार्थ नहीं देखता अर्थात् भगवान् नहीं करते, जबकि अर्जुन के लिये वे ताल ठोंककर खड़े हो जाते हैं, 'निमित्तमात्रं भव' कि कर्त्ता-धर्त्ता तो मैं हूँ, तू निमित्त बनकर खड़ा भर रह। अन्ततः वे महापुरुष कहना क्या चाहते हैं? वस्तुतः भगवान और प्रकृति के बीच एक आकर्षण रेखा है। जब तक साधक प्रकृति की सीमा में है, भगवान् नहीं करते। बहुत समीप रहकर भी द्रष्टा-रूप में ही रहते हैं। अनन्य भाव से इष्ट को पकड़ने पर वे हृदय-देश से संचालक बन जाते हैं। साधक प्रकृति की आकर्षण सीमा से निकलकर उनके क्षेत्र में आ जाता है। ऐसे अनुरागी के लिये वे ताल ठोंककर सदैव खड़े रहते हैं। केवल उसी के लिये भगवान् करते हैं। अतः चिन्तन करें। प्रश्न पूरा हुआ। आगे देखें- यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते। हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥१७॥ जिस पुरुष के अन्तःकरण में 'मैं कर्त्ता हूँ'-ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि लिपायमान नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न तो मारता है और न बँधता है। लोक-सम्बन्धी संस्कारों का विलय ही लोक-संहार है। अब उस नियत कर्म की प्रेरणा कैसे होती है? इस पर देखें-