भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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३५२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।६२।। इसलिये हे भारत! सम्पूर्ण भाव से उस ईश्वर की (जो हृदय-देश में स्थित है) अनन्य शरण को प्राप्त हो। उसके कृपा-प्रसाद से तू परमशान्ति, शाश्वत परमधाम को प्राप्त होगा। अतः ध्यान करना है तो हृदय-देश में करें। यह जानते हुए भी मन्दिर, मस्जिद, चर्च या अन्यत्र खोजना समय बरबाद करना है। हाँ, जानकारी नहीं है तब तक स्वाभाविक है। ईश्वर का निवास- स्थान हृदय है। भागवत के चतुःश्लोकी गीता का सारांश भी यही है कि वैसे तो मैं सर्वत्र हूँ; किन्तु प्राप्त होता हूँ तो हृदय-देश में ध्यान करने से ही। इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया। विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु।।६३।। इस प्रकार बस इतना ही गोपनीय से भी अतिगोपनीय ज्ञान मैंने तेरे लिये कहा है। इस विधि से सम्पूर्ण रूप से विचार कर; फिर तू जैसा चाहता है वैसा कर। सत्य यही है, शोध की स्थली यही है, प्राप्ति की स्थली भी यही है। किन्तु हृदयस्थित ईश्वर दिखायी नहीं देता, इस पर उपाय बताते हैं- सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः। इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्।।६४।। अर्जुन! सम्पूर्ण गोपनीय से भी अति गोपनीय मेरे रहस्ययुक्त वचन को तू फिर भी सुन। (कहा है, किन्तु फिर भी सुन। साधक के लिये इष्ट सदैव खड़े रहते हैं) क्योंकि तू मेरा अतिशय प्रिय है, इसलिये यह परम हितकारक वचन मैं तेरे लिये फिर भी कहूँगा। वह है क्या?- मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।।६५।। अर्जुन! तू मेरे में ही अनन्य मनवाला हो, मेरा अनन्य भक्त हो, मेरे प्रति श्रद्धा से पूर्ण हो (मेरे समर्पण में अश्रुपात होने लगे), मेरे को ही नमन कर। ऐसा करने से तू मेरे को ही प्राप्त होगा। यह मैं तेरे लिये सत्य प्रतिज्ञा करके कहता हूँ; क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है। पीछे बताया- ईश्वर हृदय-देश में