भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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उपशम ३७७ वैश्य (विधिप्राप्त), स्त्री-पुरुष कोई क्यों न हो, मेरी शरण आकर परमगति को प्राप्त होता है। अतः इस कल्याण-पथ में स्त्रियों का वही स्थान है, जो एक पुरुष का है। भौतिक समृद्धि- गीता परमकल्याण तो देती है, साथ ही मनुष्यों के लिये आवश्यक भौतिक वस्तुओं का भी विधान करती है। अध्याय ९/२०-२२ में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि बहुत से लोग निर्धारित विधि से मुझे पूजकर बदले में स्वर्ग की कामना करते हैं। उन्हें विशाल स्वर्गलोक मिलता है, मैं देता हूँ। जो माँगोगे, वह मुझसे मिलेगा; किन्तु उपभोग के पश्चात् समाप्त हो जायेगा, क्योंकि स्वर्ग के भोग भी नश्वर हैं। उन्हें पुनः जन्म लेना पड़ेगा। हाँ, मुझसे सम्बन्धित होने के कारण वे नष्ट नहीं होते; क्योंकि मैं कल्याणस्वरूप हूँ। मैं उन्हें भोग देता हूँ और शनैः-शनैः निवृत्त कराकर पुनः उन्हें कल्याण में लगा देता हूँ। क्षेत्र- जिन परमात्मा के श्रीमुख की वाणी यह गीता है उन्होंने स्वयं परिचय दिया, ‘इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।’- अर्जुन ! यह शरीर ही क्षेत्र (खेत) है, जिसमें बोया गया भला और बुरा कर्मबीज संस्काररूप में जमता है और कालान्तर में सुख-दुःख का रूप लेकर भोग के रूप में मिलता है। आसुरी सम्पद् अधम योनियों में ले जाने के लिये है, जबकि दैवी सम्पद् परमदेव परमात्मा में प्रवेश दिलाती है। सद्गुरु के सान्निध्य में इनमें निर्णायक युद्ध का आरंभ होता है, यही क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ की लड़ाई है। कुछेक टीकाकार कहते हैं- एक कुरुक्षेत्र बाहर है और दूसरा मन के भीतर है। गीता का एक अर्थ बाहरी है, दूसरा भीतरी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। वक्ता एक बात कहता है; किन्तु श्रोता अपनी बुद्धि के अनुरूप ही उसे पकड़ पाते हैं, इसीलिये अनेक अर्थ प्रतीत होते हैं। साधन-पथ पर क्रमशः चलकर जो भी पुरुष श्रीकृष्ण के स्तर पर खड़ा हो जायेगा, तो जो दृश्य श्रीकृष्ण के सामने था, वही उसके सामने भी होगा। वही महापुरुष उनके मनोगत भावों को, गीता के संकेतों को समझ सकता है, समझा सकता है। गीता का एक भी श्लोक बाहर का चित्रण नहीं करता। खाना, पहनना, रहना आप जानते ही हैं। रहन-सहन, मान्यता, लोकरीति-नीति में देश-काल

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