भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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३७८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता और परिस्थितियों के अनुकूल परिवर्तन प्रकृति की देन है। इसमें श्रीकृष्ण आपको कौन-सी व्यवस्था दें? कहीं लड़कियों का बाहुल्य है, बहु विवाह होते हैं, तो कहीं उनकी संख्या कम है। कहीं कई भाइयों के बीच एक पत्नी रह लेती है- इसमें श्रीकृष्ण कौन-सी व्यवस्था दें। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् जापान में जनसंख्या की कमी समस्या बन गयी तो तीस बच्चों को जन्म देने वाली एक महिला को मदरलैंड (देश की माता) की उपाधि से सम्मानित किया गया। वैदिककालीन भारत में पहले दस सन्तान उत्पन्न करने का विधान था, अब 'एक या दो बच्चे, होते हैं घर में अच्छे' का नारा लग रहा है। कदाचित् वे न रहें तो देश के लिए चिन्ता का विषय नहीं, समस्या का हल ही होता है। श्रीकृष्ण इसमें कौन-सी व्यवस्था दें? श्रेय- काम, क्रोध, लोभ, मोह के कहीं स्कूल नहीं खुले हैं, फिर भी इन विकारों में लड़के बड़े तथा सयानों से कहीं अधिक प्रवीण निकलते हैं। इसमें श्रीकृष्ण क्या शिक्षा दें? यह सब तो प्रकृति द्वारा स्वचालित हैं। कभी वेद पढ़ाये जाते थे, धनुर्वेद-गदायुद्ध सिखाया जाता था, आज इन्हें कौन सीखता है? आज तो पिस्टल चला रहे हैं। स्वचालित यन्त्रों का युग है। कभी रथ- संचालन सीखना पड़ता था, घोड़ों की लीद फेंकनी पड़ती थी; आज मोटरों का तेल साफ किया जाता है। इसमें श्रीकृष्ण क्या बतायें? कह दें कि घोड़ों को ऐसे मत मलो ! बाहर आपको कैसी व्यवस्था दें? पहले स्वाहा बोलने से वर्षा होती थी, आज मनचाही फसल लेने लगे हैं। योगेश्वर कहते हैं कि प्रकृति से उत्पन्न गुणों द्वारा परवश होकर मनुष्य परिस्थिति के अनुसार ढलता ही रहता है। गुण स्वतः उन्हें ढालने में सक्षम हैं। भौतिकशास्त्र, समाजशास्त्र, शिक्षाशास्त्र, अर्थशास्त्र, तर्कशास्त्र वह गढ़ता ही रहता है। एक ही वस्तु ऐसी है जो मनुष्य नहीं जानता, नहीं पहचानता। जो है तो उसी के पास किन्तु उसे विस्मृत है। गीता सुनकर अर्जुन की वही स्मृति लौट आयी थी। वह स्मृति है परमात्मा की, जो हृदय- देश में होकर भी उससे बहुत दूर है। उसी को मनुष्य पाना चाहता है; किन्तु रास्ता नहीं पाता। केवल कल्याण-पथ से ही मनुष्य अनभिज्ञ है। मोह का आवरण इतना घना है कि उधर सोचने का समय ही नहीं मिलता। उन महापुरुष ने आपके लिये समय दिया है, उस कर्म को स्पष्ट किया है, जिसे