भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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३८४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता गीतोक्त ज्ञान ही विशुद्ध मनुस्मृति- गीता आदिमानव महाराज मनु से भी पूर्व प्रकट हुई है- 'इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।' (४/१) अर्जुन ! इस अविनाशी योग को मैंने कल्प के आदि में सूर्य से कहा तथा सूर्य ने मनु से कहा। मनु ने उसे श्रवण कर अपनी याददाश्त में धारण किया; क्योंकि श्रवण की गयी वस्तु मन की स्मृति में ही रखी जा सकती है। इसी को मनु ने राजा इक्ष्वाकु से कहा। इक्ष्वाकु से राजर्षियों ने जाना और इस महत्त्वपूर्ण काल से यह अविनाशी योग इसी पृथ्वी में लुप्त हो गया। आरम्भ में कहने और श्रवण करने की परम्परा थी। लिखा भी जा सकता है- ऐसी कल्पना नहीं थी। मनु महाराज ने इसे मानसिक स्मृति में धारण किया तथा स्मृति की परम्परा दी। इसलिये यह गीतोक्त ज्ञान ही विशुद्ध मनुस्मृति है। भगवान ने यह ज्ञान मनु से भी पूर्व सूर्य से कहा तो इसे 'सूर्यस्मृति' क्यों नहीं कहते? वस्तुतः सूर्य ज्योतिर्मय परमात्मा का वह अंश है जिससे इस मानव सृष्टि का सृजन हुआ। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, "मैं ही परम चेतन बीजरूप से पिता हूँ, प्रकृति गर्भ धारण करनेवाली माँ है।" वह बीजरूप पिता सूर्य है। सूर्य परमात्मा की वह प्रशक्ति है जिसने मानव की संरचना की। वह कोई व्यक्ति नहीं और जहाँ परमात्मा के उस ज्योतिर्मय तेज से मानव की उत्पत्ति हुई, उस तेज में वह गीतोक्त ज्ञान भी प्रसारित किया अर्थात् सूर्य से कहा। सूर्य ने आदि मनु से कहा इसलिये यह अविनाशी योग ही 'मनुस्मृति' है। सूर्य कोई व्यक्ति नहीं, बीज है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन ! वही पुरातन योग मैं तेरे लिये कहने जा रहा हूँ। तू प्रिय भक्त है, अनन्य सखा है। अर्जुन मेधावी थे, सच्चे अधिकारी थे। उन्होंने प्रश्न-परिप्रश्नों की श्रृंखला खड़ी कर दी कि- आपका जन्म तो अब हुआ है और सूर्य का जन्म बहुत पहले हुआ है। इसे आपने ही सूर्य से कहा, यह मैं कैसे मान लूँ? इस प्रकार बीस-पच्चीस प्रश्न उन्होंने किये। गीता के समापन तक उनके सम्पूर्ण प्रश्न समाप्त हो गये, तब भगवान ने, जो प्रश्न अर्जुन नहीं कर सकते थे, जो उनके हित में थे, उन्हें स्वयं उठाया और समाधान दिया। अन्ततः भगवान ने कहा- अर्जुन ! क्या तुमने मेरे उपदेश को