यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम ३८५ एकाग्रचित्त हो श्रवण किया? क्या मोह से उत्पन्न तुम्हारा अज्ञान नष्ट हुआ? अर्जुन ने कहा- नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत। स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।। ( १८/७३ ) भगवन्! मेरा मोह नष्ट हुआ। मैं स्मृति को प्राप्त हुआ हूँ। केवल सुना भर नहीं अपितु स्मृति में धारण कर लिया है। मैं आपके आदेश का पालन करूँगा, युद्ध करूँगा। उन्होंने धनुष उठा लिया, युद्ध हुआ, विजय प्राप्त की, एक विशुद्ध धर्म-साम्राज्य की स्थापना हुई और एक धर्मशास्त्र के रूप में वही आदि धर्मशास्त्र गीता पुनः प्रसारण में आ गयी। गीता आपका आदि धर्मशास्त्र है। यही मनुस्मृति है, जिसे अर्जुन ने अपनी स्मृति में धारण किया था। मनु के समक्ष दो कृतियों का उल्लेख है- एक तो सूर्य से उपलब्ध गीता, दूसरे वेद मनु के समक्ष उतरे। तीसरी कोई कृति मनु के समय में प्रकट नहीं हुई थी। उस समय लिखने-लिखाने का प्रचलन नहीं था, कागज-कलम का प्रचलन नहीं था इसलिये ज्ञान को श्रुत अर्थात् सुनने और स्मृति-पटल पर धारण करने की परम्परा थी। जिनसे मानवों का प्रादुर्भाव हुआ, सृष्टि के प्रथम मानव उन मनु महाराज ने वेद को श्रुति तथा गीता को स्मृति का सम्मान दिया। वेद मनु के समक्ष उतरे थे, इन्हें सुनें, यह सुनने योग्य हैं; किन्तु गीता स्मृति है, सदा स्मरण रखें। यह हर मानव को सदा रहनेवाला जीवन, सदा रहनेवाली शान्ति और सदा रहनेवाली समृद्धि, ऐश्वर्यसम्पन्न जीवन प्राप्त करानेवाला ईश्वरीय गायन है। भगवान ने कहा- अर्जुन! यदि तू अहंकारवश मेरे उपदेश को नहीं सुनेगा तो विनष्ट हो जायेगा अर्थात् गीता के उपदेशों की अवहेलना करनेवाला नष्ट हो जाता है। अध्याय पन्द्रह के अन्तिम श्लोक (१५/२०) में भगवान ने कहा, ‘इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।’- यह गोपनीय से भी अति गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया। इसे तत्त्व से जानकर तू समस्त ज्ञान और परमश्रेय की प्राप्ति कर लेगा। अध्याय सोलह के अन्तिम दो श्लोकों में कहा-