भारतकोश
संग्रह पर लौटें

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

DevanagariHindipublished429 पृष्ठ

उपशम ३८५ एकाग्रचित्त हो श्रवण किया? क्या मोह से उत्पन्न तुम्हारा अज्ञान नष्ट हुआ? अर्जुन ने कहा- नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत। स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।। ( १८/७३ ) भगवन्! मेरा मोह नष्ट हुआ। मैं स्मृति को प्राप्त हुआ हूँ। केवल सुना भर नहीं अपितु स्मृति में धारण कर लिया है। मैं आपके आदेश का पालन करूँगा, युद्ध करूँगा। उन्होंने धनुष उठा लिया, युद्ध हुआ, विजय प्राप्त की, एक विशुद्ध धर्म-साम्राज्य की स्थापना हुई और एक धर्मशास्त्र के रूप में वही आदि धर्मशास्त्र गीता पुनः प्रसारण में आ गयी। गीता आपका आदि धर्मशास्त्र है। यही मनुस्मृति है, जिसे अर्जुन ने अपनी स्मृति में धारण किया था। मनु के समक्ष दो कृतियों का उल्लेख है- एक तो सूर्य से उपलब्ध गीता, दूसरे वेद मनु के समक्ष उतरे। तीसरी कोई कृति मनु के समय में प्रकट नहीं हुई थी। उस समय लिखने-लिखाने का प्रचलन नहीं था, कागज-कलम का प्रचलन नहीं था इसलिये ज्ञान को श्रुत अर्थात् सुनने और स्मृति-पटल पर धारण करने की परम्परा थी। जिनसे मानवों का प्रादुर्भाव हुआ, सृष्टि के प्रथम मानव उन मनु महाराज ने वेद को श्रुति तथा गीता को स्मृति का सम्मान दिया। वेद मनु के समक्ष उतरे थे, इन्हें सुनें, यह सुनने योग्य हैं; किन्तु गीता स्मृति है, सदा स्मरण रखें। यह हर मानव को सदा रहनेवाला जीवन, सदा रहनेवाली शान्ति और सदा रहनेवाली समृद्धि, ऐश्वर्यसम्पन्न जीवन प्राप्त करानेवाला ईश्वरीय गायन है। भगवान ने कहा- अर्जुन! यदि तू अहंकारवश मेरे उपदेश को नहीं सुनेगा तो विनष्ट हो जायेगा अर्थात् गीता के उपदेशों की अवहेलना करनेवाला नष्ट हो जाता है। अध्याय पन्द्रह के अन्तिम श्लोक (१५/२०) में भगवान ने कहा, ‘इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।’- यह गोपनीय से भी अति गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया। इसे तत्त्व से जानकर तू समस्त ज्ञान और परमश्रेय की प्राप्ति कर लेगा। अध्याय सोलह के अन्तिम दो श्लोकों में कहा-

३८६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता ‘यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।’ इस शास्त्रविधि को त्यागकर, कामनाओं से प्रेरित होकर अन्य विधियों से जो भजते हैं उनके जीवन में न सुख है, न समृद्धि है और न परमगति ही है। ‘तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।’ इसलिये अर्जुन! तुम्हारे कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था में यह शास्त्र ही प्रमाण है। इसको भली प्रकार अध्ययन कर, तत्पश्चात् आचरण कर। तुम मुझमें निवास करोगे, अविनाशी पद प्राप्त कर लोगे। सदा रहनेवाला जीवन, सदा रहनेवाली शान्ति और समृद्धि पा लोगे। गीता मनुस्मृति है और भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार गीता ही धर्मशास्त्र है। अन्य कोई शास्त्र नहीं, कोई अन्य स्मृति नहीं है। समाज में प्रचलित अनेकानेक स्मृतियाँ गीता के विस्मृत हो जाने का दुष्परिणाम हैं। स्मृतियाँ कतिपय राजाओं के संरक्षण में प्रशासन चलाने के लिये लिखी गयीं, जिनसे समाज में ऊँच-नीच की दीवारें सृजित हो गयीं। मनु के नाम पर प्रचारित तथा कथित मनुस्मृति में मनुकालीन वातावरण का चित्रण नहीं है। मूल मनुस्मृति गीता एक परमात्मा को ही सत्य मानती है, उसमें विलय दिलाती है; किन्तु वर्तमान काल में प्रचलित लगभग १६४ स्मृतियाँ परमात्मा का नाम तक नहीं लेतीं, न परमात्मा की प्राप्ति के उपायों पर प्रकाश डालती हैं। वे केवल स्वर्ग के आरक्षण तक ही सीमित रहकर ‘न अस्ति’- जो है नहीं, उन्हीं को ही प्रोत्साहन देती हैं। मोक्ष का उनमें उल्लेख तक नहीं है। महापुरुष- महापुरुष बाह्य तथा आन्तरिक, व्यावहारिक तथा आध्यात्मिक, लोक-रीति और यथार्थ वेद-रीति दोनों की जानकारी रखता है। यही कारण है कि समस्त समाज को महापुरुषों ने रहन-सहन का विधान बताया और एक मर्यादित व्यवस्था दी। वशिष्ठ, विश्वामित्र, स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण, महावीर स्वामी, महात्मा बुद्ध, मूसा, ईसा, मुहम्मद, रामदास, दयानन्द, गुरु गोविन्द सिंह इत्यादि सहस्रों महापुरुषों ने ऐसा किया; किन्तु व्यवस्थाएँ सामयिक होती हैं। पीड़ित समाज को भौतिक वस्तु प्रदान करना यथार्थ नहीं है। भौतिक उलझनें क्षणिक हैं शाश्वत नहीं, इसलिये उनका हल भी तत्सामयिक होता है। उन्हें चिरंतन व्यवस्था के रूप में ग्रहण नहीं किया जा सकता।

उपशम ३८७ व्यवस्थाकार- सामाजिक विकृतियों को महापुरुष सुलझाया करते हैं। यदि इन्हें न सुलझाया जाय तो ज्ञान-वैराग्यजनित परम की साधना कौन सुनेगा? व्यक्ति जिस वातावरण मे फँसा है, उसे वहाँ से हटाकर यथार्थ को जानने की स्थिति में लाने के लिये अनेकानेक प्रलोभन दिये जाते हैं। एतदर्थ महापुरुष जिन शब्दों का प्रयोग करते हैं, कोई व्यवस्था देते हैं, वह धर्म नहीं है। उससे सौ-दो सौ साल की व्यवस्था मिलती है, चार-छः सौ साल के लिये उदाहरण बन जाता है और हजार दो हजार वर्ष में वह सामाजिक आविष्कार नवीन परिस्थितियों के साथ-साथ निष्प्राण हो जाता है। गुरु गोविन्द सिंह की सामाजिक व्यवस्था में शस्त्र अनिवार्य था। क्या अब उस तलवार का शस्त्र के स्थान पर औचित्य है? ईसा गदहे पर बैठते थे। (मत्ती, २१) गदहे के सम्बन्ध में उनकी दी हुई व्यवस्थाओं का आज क्या उपयोग है? कहा- किसी का गधा मत चुराओ। आज गधा कौन पालता है? इसी प्रकार योगेश्वर श्रीकृष्ण ने उस समय के समाज को सम्यक् व्यवस्थित किया, जिसका उल्लेख महाभारत, भागवत इत्यादि ग्रन्थों में है, साथ ही इन ग्रन्थों में उन्होंने यथार्थ का भी यत्र- तत्र चित्रण किया। परमकल्याणकारी साधना और भौतिक व्यवस्थाओं के निर्देश को एक में मिला देने से समाज तत्त्वनिर्णायक क्रम को पूरा-पूरा नहीं समझ पाता। भौतिक व्यवस्थाओं को वह ज्यों-का-त्यों नहीं बल्कि बढ़ा- चढ़ाकर ग्रहण करता है; क्योंकि वह भौतिक है। “महापुरुष ने कहा”- ऐसा कहकर इन व्यवस्थाओं के लिये महापुरुषों की दुहाई भी देते हैं। वे महापुरुष की वास्तविक क्रिया को तोड़-मरोड़कर उसे भ्रामक बना देते हैं। वेद, रामायण, महाभारत, बाइबिल, कुरान सबके प्रति पूर्वाग्रहयुक्त धूमिल धारणाएँ शेष हैं। बाह्य धरातल पर जीवनयापन करनेवाला समाज उनके कथन का स्थूल आशय ही ग्रहण कर पाता है। इसीलिये भगवान श्रीकृष्ण ने शाश्वत धाम, अनन्त जीवन, सदा रहनेवाली शान्ति प्रदायिनी गीता शास्त्र को भौतिक व्यवस्थाओं से पृथक् किया। महाभारत भारत का बृहत् इतिहास तथा गौरवशाली संस्कृति शास्त्र है। उन्होंने इस विशाल इतिहास के मध्य इसका गायन किया, जिससे भविष्य में आनेवाली समस्त पीढ़ियाँ इस धर्मशास्त्र को धार्मिक धरातल पर यथावत समझ सकें। कालान्तर में महर्षि पतञ्जलि इत्यादि अनेक महापुरुषों ने

३८८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता भी परमश्रेय की यथार्थ विधि को सामाजिक व्यवस्था से हटाकर अलग प्रस्तुत किया। गीता मनुष्य मात्र के लिये- भगवान ने इस धर्मशास्त्र का उपदेश ‘प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते’ (गीता, १/२०)- ठीक शस्त्र-सञ्चालन के समय किया क्योंकि वह भली प्रकार जानते थे कि भौतिक संसार में कभी शान्ति और सुख होता ही नहीं। अरबों लोगों की आहुति के उपरान्त भी जो विजेता होंगे, वह भी विफल मनोरथ और अन्ततः उदास ही होंगे, इसलिये उन्होंने ऐसे शाश्वत युद्ध का परिचय गीता के माध्यम से दिया, जिसमें एक बार विजय हो जाने पर सदा रहनेवाली विजय, अनन्त विजय और अक्षय धाम है जो मानव मात्र के लिये सदैव सुलभ है, जो क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ की लड़ाई है, प्रकृति और पुरुष का संघर्ष है, अन्तःकरण में अशुभ का अन्त और शुभ परमात्मस्वरूप की प्राप्ति का साधन है। उत्तम अधिकारी के प्रति ही उन्होंने उसे व्यक्त किया। श्रीकृष्ण ने बार- बार कहा कि तुझ अतिशय प्रीति रखनेवाले भक्त के प्रति हित की इच्छा से कहता हूँ। यह अति गोपनीय है। अन्त में उन्होंने कहा- जो भक्त नहीं हो तो प्रतीक्षा करो, उसको रास्ते पर लाओ, फिर उसी के लिये कहो। यही मनुष्य मात्र के लिये यथार्थ कल्याण का एकमात्र साधन है, जिसका क्रमबद्ध वर्णन श्रीकृष्णोक्त गीता है। प्रस्तुत टीका- योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा प्रसारित श्रीमद्भगवद्गीता के आशय का यथावत् अनुवाद करने के कारण प्रस्तुत टीका का नाम ‘यथार्थ गीता’ है। यह भगवान् की अन्तस्प्रेरणा पर आधारित है। गीता अपने में पूर्ण साधन-ग्रन्थ है। सम्पूर्ण गीता में सन्देह का एक भी स्थल नहीं है। जहाँ कहीं सन्देह है, वह बौद्धिक स्तर पर इसे जाना नहीं जा सकता है, इसलिये प्रतीत होता है। अतः कहीं समझ में न आये तो किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के सान्निध्य में समझने का प्रयास करें। तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।। ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!

निवेदन 'यथार्थ गीता' योगेश्वर श्रीकृष्ण की परम पुनीत वाणी श्रीमद्भगवद्गीता का ही अर्थ है। इसमें आपके हृदय में स्थित परमात्मा की प्राप्ति के विधान का प्राप्ति के पश्चात् किया गया चित्रण है। अवहेलना की दृष्टि से इसका उपयोग वर्जित है, अन्यथा हम अपने लक्ष्य की जानकारी से वंचित रह जायेंगे। इसके श्रद्धापूर्वक अध्ययन से मानव अपने कल्याण के साधन से भरपूर हो जाता है और यत्किंचित् भी ग्रहण करेगा तो परमश्रेय को प्राप्त कर लेगा; क्योंकि इस ईश्वर-पथ में आरम्भ का कभी नाश नहीं होता। – स्वामी अड़गड़ानन्द

कैसेट प्रसारण में अध्यायों के पूर्व की भूमिका १. केवल एक परमात्मा में श्रद्धा और समर्पण का सन्देश देनेवाली गीता सबको पवित्र करने का खुला आमन्त्रण देती है। सृष्टि में कहीं भी रहनेवाले अमीर अथवा गरीब, कुलीन तथा आदिवासी, पुण्यात्मा और पापी, स्त्री और पुरुष, सदाचारी एवं अत्यन्त दुराचारी- सबका उसमें प्रवेश है। विशेषकर गीता पापियों के ही उद्धार का सुगम पथ बताती है, पुण्यात्मा तो भजते ही हैं। प्रस्तुत है उसी गीता की अद्वितीय व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ का कैसेट प्रसारण। २. शास्त्र की रचना दो दृष्टियों से की जाती है- एक तो सामाजिक व्यवस्था और संस्कृति को कायम रखना, जिससे लोग पूर्वजों के पदचिह्नों का अनुकरण कर सकें तथा दूसरा यह कि वे शाश्वत शान्ति को प्राप्त कर लें। रामचरितमानस, बाइबिल, कुरान इत्यादि में दोनों पक्षों का समावेश है; किन्तु भौतिक दृष्टि- प्रधान होने के कारण मनुष्य समाजोपयोगी व्यवस्था को ही पकड़ पाता है। आध्यात्मिक सूक्तियों को भी वह सामाजिक व्यवस्था के ही सन्दर्भ में देखने लगता है। कहता है कि ऐसा तो शास्त्र में लिखा है। इसलिये वेदव्यास ने दोनों के लिये एक ही ग्रन्थ महाभारत लिखते हुए भी आध्यात्मिक क्रिया का संकलन गीता के रूप में अलग से किया, जिससे कि लोग इस मूल कल्याण- पथ में भ्रान्ति का मिश्रण न कर सकें। उन्हीं आध्यात्मिक मूल्यों के साथ प्रस्तुत है गीता का दिव्य सन्देश। ३. गीता किसी विशेष व्यक्ति, किसी जाति, वर्ग, पन्थ, देश-काल या किसी रूढ़िग्रस्त सम्प्रदाय का ग्रन्थ नहीं है, बल्कि यह सार्वलौकिक तथा सार्वकालिक धर्मशास्त्र है। यह प्रत्येक देश, प्रत्येक जाति, प्रत्येक आयु के प्रत्येक स्त्री- पुरुष के लिये, सबके लिये है। सचमुच गीता सम्पूर्ण मानव जाति का धर्मशास्त्र है। और कितने गौरव की बात है कि गीता आपका धर्मशास्त्र है। ४. पूज्य भगवान महावीर, तथागत भगवान बुद्ध विज्ञ होते हुए भी लोकभाषाओं में गीता के ही सन्देशवाहक हैं। आत्मा सत्य है और पूर्ण संयम से आत्मस्थिति का विधान है- यह गीता का ही विचार है। बुद्ध ने उसी तत्त्व को सर्वज्ञ तथा अविनाशी पद कहकर गीता के ही विचार को पुष्ट किया है। इतना ही नहीं

अपितु विश्व वाङ्मय में धर्म के नाम पर जो कुछ भी सार-सर्वस्व है, जैसे- एक ईश्वर, प्रार्थना, पश्चाताप, तप इत्यादि गीता के ही उपदेश हैं। वही उपदेश स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी के मुखाब्ज से निःसृत यथार्थ गीता कैसेट रूप में मानव की मुक्ति का दिव्य सन्देश बनकर उपस्थित है। ५. भारत की लोकगाथाओं में है कि सुकरात की शिष्य-परम्परा के मनीषी अरस्तू ने अपने शिष्य सिकन्दर को भारत से गीताज्ञानी गुरु लाने का निर्देश दिया था। गीता के ही एकेश्वरवाद को विश्व की विविध भाषाओं में मूसा, ईसा तथा अनेक सूफी महात्माओं ने फैलाया। भाषान्तर होने से ये पृथक्- पृथक् प्रतीत होते हैं, किन्तु सिद्धान्त गीता के ही हैं। अतः गीता मानव मात्र का अतर्क्य धर्मशास्त्र है। गीता का आशय ‘यथार्थ गीता’ के रूप में प्रस्तुत कर स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी महाराज ने मानवमात्र को एक अमूल्य निधि दी है, जिसका कैसेट रूपान्तरण श्री जीतेन भाई के सौजन्य से हुआ है। गीता के दसियों हजार अनुवादों के बीच देदीप्यमान इस व्याख्या के आलोक में आप सब परमश्रेय के साधक बनें। ६. संसार में प्रचलित सभी धर्म गीता की दूरस्थ प्रतिध्वनि मात्र हैं। स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी महाराज द्वारा इसकी व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ को सुनकर जैन कुलोत्पन्न श्री जीतेन भाई जी ने व्रत ही ले लिया कि कैसेटों के माध्यम से इसका प्रसारण करूँ; क्योंकि भगवान महावीर, भगवान गौतम बुद्ध, गुरु नानक, कबीर इत्यादि के श्रद्धापूरित तप-सिद्धान्तों की उच्चतम अभिव्यक्ति गीता है। गीता के वे ही कैसेट सुमन आप सबके समक्ष आत्म-दर्शनार्थ प्रस्तुत हैं। ७. गीता के दो हजार वर्ष बाद तक धर्म के नाम पर सम्प्रदाय नहीं बने थे, इसीलिये गीता मज़हबमुक्त है। उस समय विश्व-मनीषा में एक ही शास्त्र गूँज रहा था- उपनिषद्-सार गीता ! मोक्ष और समृद्धि की स्रोत गीता ! ! शास्त्र पढ़ने की अपेक्षा उसका श्रवण अधिक लाभदायक है; क्योंकि उच्चारण की शुद्धता इत्यादि में एकाग्रता बँट जाती है। इसीलिये सरल भाषा में रूपान्तरित यथार्थ गीता के ये कैसेट आपकी सेवा में प्रस्तुत हैं। इनके श्रवण

से बच्चे-बच्चे में, पास-पड़ोस में परमात्मा के शुभ संस्कारों का संचार होगा, आपके घर-आँगन का वायुमण्डल भी तपोभूमि-सा सुरभित हो उठेगा। ८. वह घर श्मशान है जिसमें प्रभु-चर्चा न हो। आज का मानव इतना व्यस्त है कि चाहकर भी भजन के लिये समय नहीं निकाल पाता। ऐसी परिस्थिति में गीता का सन्देश कर्ण-कुहरों तक पहुँच भर जाय तो परमश्रेय और समृद्धि के संस्कारों का बीजारोपण हो जाता है। भगवान की वाणी के इन कैसेटों से दिन भर उस परम प्रभु का स्मरण बना रहेगा और यही भजन की आधारशिला है। ९. अपने बच्चों को हम शिक्षा दिलाते हैं कि वह अच्छे संस्कारों का अर्जन करें। अच्छे संस्कारों का आशय लोग लेते हैं कि वह अपनी रोजी-रोटी, आवास-विकास की समस्याओं को हल कर ले। ईश्वर की ओर किसी का ध्यान ही नहीं है। किसी-किसी के पास इतना कुछ है कि प्रभु को पुकारने की आवश्यकता ही नहीं समझता। किन्तु यह सब कुछ पार्थिव ही तो है। न चाहते हुए भी सारा वैभव यहीं छोड़कर जाना पड़ता है। ऐसी स्थिति में ईश्वर की पहचान ही एकमात्र सम्बल है, जिसे प्रदान कर रहा है यथार्थ गीता का यह कैसेट प्रसारण। १०. संसार में जितने भी धार्मिक मत-मतान्तर हैं, वे सब-के-सब किसी महापुरुष के पीछे श्रद्धालुओं का संगठित समाज है। महापुरुष की एकान्त भजनस्थली ही कालान्तर में तीर्थ, आश्रम, मठ और मन्दिरों का रूप ले लेते हैं, जहाँ महापुरुष के नाम पर जीविकोपार्जन से लेकर विलासिता तक के साधन जुटाये जाते हैं। गद्दियाँ महापुरुष के बाद बनती हैं, गद्दियों से कोई महापुरुष नहीं बनता। इसीलिये धर्म सदा से ही प्रत्यक्षदर्शी महापुरुष के क्षेत्र की वस्तु रहा है। गीता ऐसे ही निर्विवाद महापुरुष योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण की वाणी है, जिसके चिरन्तन सत्यों से आपका साक्षात् करा रहा है 'यथार्थ गीता' का यह कैसेट प्रसारण।

गीता आपका धर्मशास्त्र है। विश्व में प्रचलित सम्पूर्ण धार्मिक विचारों के आदि उद्गम स्थल भारत के समस्त अध्यात्म और आत्मस्थिति दिलानेवाले सम्पूर्ण शोध के साधन-क्रम का स्पष्ट वर्णन इस गीता में है, जिसमें ईश्वर एक, पाने की क्रिया एक, पथ में अनुकम्पा एक तथा परिणाम एक है - वह है प्रभु का दर्शन, भगवत्स्वरूप की प्राप्ति और काल से अतीत अनन्त जीवन। देखें - 'यथार्थ गीता'।

शास्त्र परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाले क्रियात्मक अनुशासन के नियमों का संकलन ही शास्त्र है। इस दृष्टि से भगवान श्रीकृष्णोक्त गीता सनातन, शाश्वत धर्म का शुद्ध शास्त्र है; जो चारों वेद, उपनिषद, समस्त योगशास्त्र, रामचरित मानस तथा विश्व के सभी दर्शनशास्त्रों का अकेले ही प्रतिनिधित्व करती है। गीता मानव मात्र के लिए धर्म का अतर्क्य शास्त्र है। परमात्मा का निवास वह सर्वसमर्थ, सदा रहनेवाला परमात्मा मानव के हृदय में स्थित है। सम्पूर्ण भावों से उसकी शरण जाने का विधान है, जिससे शाश्वत धाम, सदा रहनेवाली शान्ति तथा अनन्त जीवन की प्राप्ति होती है। सन्देश सत्य वस्तु का तीनों कालों में अभाव नहीं है और असत्य वस्तु का अस्तित्व नहीं है। परमात्मा ही तीनों कालों में सत्य है, शाश्वत है, सनातन है।

  • स्वामी अड़गड़ानन्द ५२०० ५२०० ५२०० ५२०० ५२०० ५२०० ५२०० ५२०० ५२०० ५२०० ५२०० ५२०० ५२०० ५२०० वर्षों के लम्बे अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या ॥ श्रीमद् भगवद् गीता ॥ ॥ यथार्थ गीता ॥ मानव धर्मशास्त्र ॐ श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट न्यू अपोलो एस्टेट, गाला नं 5, मोगरा लेन (रेलवे सबवे के पास), अंधेरी (पूर्व), मुम्बई – 400069 फोन - (022) 28255300 • ई-मेल - contact@yatharthgeeta.com • वेबसाइट - www.yatharthgeeta.com