भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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३८६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता ‘यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।’ इस शास्त्रविधि को त्यागकर, कामनाओं से प्रेरित होकर अन्य विधियों से जो भजते हैं उनके जीवन में न सुख है, न समृद्धि है और न परमगति ही है। ‘तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।’ इसलिये अर्जुन! तुम्हारे कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था में यह शास्त्र ही प्रमाण है। इसको भली प्रकार अध्ययन कर, तत्पश्चात् आचरण कर। तुम मुझमें निवास करोगे, अविनाशी पद प्राप्त कर लोगे। सदा रहनेवाला जीवन, सदा रहनेवाली शान्ति और समृद्धि पा लोगे। गीता मनुस्मृति है और भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार गीता ही धर्मशास्त्र है। अन्य कोई शास्त्र नहीं, कोई अन्य स्मृति नहीं है। समाज में प्रचलित अनेकानेक स्मृतियाँ गीता के विस्मृत हो जाने का दुष्परिणाम हैं। स्मृतियाँ कतिपय राजाओं के संरक्षण में प्रशासन चलाने के लिये लिखी गयीं, जिनसे समाज में ऊँच-नीच की दीवारें सृजित हो गयीं। मनु के नाम पर प्रचारित तथा कथित मनुस्मृति में मनुकालीन वातावरण का चित्रण नहीं है। मूल मनुस्मृति गीता एक परमात्मा को ही सत्य मानती है, उसमें विलय दिलाती है; किन्तु वर्तमान काल में प्रचलित लगभग १६४ स्मृतियाँ परमात्मा का नाम तक नहीं लेतीं, न परमात्मा की प्राप्ति के उपायों पर प्रकाश डालती हैं। वे केवल स्वर्ग के आरक्षण तक ही सीमित रहकर ‘न अस्ति’- जो है नहीं, उन्हीं को ही प्रोत्साहन देती हैं। मोक्ष का उनमें उल्लेख तक नहीं है। महापुरुष- महापुरुष बाह्य तथा आन्तरिक, व्यावहारिक तथा आध्यात्मिक, लोक-रीति और यथार्थ वेद-रीति दोनों की जानकारी रखता है। यही कारण है कि समस्त समाज को महापुरुषों ने रहन-सहन का विधान बताया और एक मर्यादित व्यवस्था दी। वशिष्ठ, विश्वामित्र, स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण, महावीर स्वामी, महात्मा बुद्ध, मूसा, ईसा, मुहम्मद, रामदास, दयानन्द, गुरु गोविन्द सिंह इत्यादि सहस्रों महापुरुषों ने ऐसा किया; किन्तु व्यवस्थाएँ सामयिक होती हैं। पीड़ित समाज को भौतिक वस्तु प्रदान करना यथार्थ नहीं है। भौतिक उलझनें क्षणिक हैं शाश्वत नहीं, इसलिये उनका हल भी तत्सामयिक होता है। उन्हें चिरंतन व्यवस्था के रूप में ग्रहण नहीं किया जा सकता।