भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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पृष्ठ 96

द्वितीय अध्याय ६१ परायण बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धिनाश होने से यह पुरुष अपने श्रेय- साधन से च्युत हो जाता है। यहाँ श्रीकृष्ण ने बल दिया है कि विषयों का चिन्तन नहीं करना चाहिये। साधक को नाम, रूप, लीला और धाम में ही कहीं लगे रहना चाहिये। भजन में ढील देने पर मन विषयों में जायेगा। विषयों के चिन्तन से आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से उस विषय की कामना साधक के अन्तर्मन में होने लगती है। कामना की पूर्ति में व्यवधान होने पर क्रोध, क्रोध से अविवेक, अविवेक से स्मृति-भ्रम और स्मृति-भ्रम से बुद्धि नष्ट हो जाती है। निष्काम कर्मयोग को बुद्धियोग कहा जाता है; क्योंकि बुद्धि-स्तर पर इसमें विचार रखना चाहिये कि कामनाएँ न आने पाएँ, फल है ही नहीं। कामना आने से यह बुद्धियोग नष्ट हो जाता है। 'साधन करिय बिचारहीन मन सुद्ध होय नहिं तैसे।' (विनयपत्रिका, पद संख्या ११५/३) विचार आवश्यक है। विचारशून्य पुरुष श्रेय-साधन से नीचे गिर जाता है। साधन-क्रम टूट जाता है, सर्वथा नष्ट नहीं होता। भोग के पश्चात् साधन वहीं से पुनः आरम्भ होता है, जहाँ अवरुद्ध हुआ था। यह तो विषयाभिमुख साधक की गति है। स्वाधीन अन्तःकरणवाला साधक किस गति को प्राप्त होता है? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं- रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।।६४।। आत्मा की विधि को प्राप्त प्रत्यक्षदर्शी महापुरुष राग-द्वेष से रहित वश में की हुई अपनी इन्द्रियों द्वारा 'विषयान् चरन्'- विषयों में विचरता हुआ भी 'प्रसादमधिगच्छति'- अन्तःकरण की निर्मलता को प्राप्त होता है। वह अपनी भावदृष्टि में रहता है। महापुरुष के लिये विधि-निषेध नहीं रह जाते। उसके लिये कहीं अशुभ नहीं रहता, जिससे वह बचाव करे तथा उसके लिये कोई शुभ शेष नहीं रह जाता, जिसकी वह कामना करे। प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते। प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।।६५।।