भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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६२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता भगवान् के पूर्ण कृपा-प्रसाद 'भगवत्ता' से संयुक्त होने पर उसके सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है, 'दुःखालयम् अशाश्वतम्' ।( गीता, ८/१५ ) संसार का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्तवाले पुरुष की बुद्धि शीघ्र ही अच्छी प्रकार स्थिर हो जाती है। किन्तु जो योगयुक्त नहीं है, उसकी दशा पर प्रकाश डालते हैं- नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना। न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ।।६६।। योगसाधनरहित पुरुष के अन्तःकरण में निष्काम कर्मयुक्त बुद्धि नहीं होती। उस अयुक्त के अन्तःकरण में भाव भी नहीं होता। भावनारहित पुरुष को शान्ति कहाँ और अशान्त पुरुष को सुख कहाँ? योगक्रिया करने से कुछ दिखायी पड़ने पर ही भाव बनता है- 'जानें बिनु न होइ परतीती।' ( रामचरितमानस, ७/८८ ख/७ ) भावना बिना शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित पुरुष को सुख अर्थात् शाश्वत, सनातन की प्राप्ति नहीं होती। इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनु विधीयते। तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ।।६७।। जल में नाव को जिस प्रकार वायु हरण करके गन्तव्य से दूर कर देती है, ठीक वैसे ही विषयों में विचरण करती हुई इन्द्रियों में जिस इन्द्रिय के साथ मन रहता है, वह एक ही इन्द्रिय उस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है। अतः योग का आचरण अनिवार्य है। क्रियात्मक आचरण पर श्रीकृष्ण पुनः बल देते हैं- तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।६८।। इससे हे महाबाहो ! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों से सर्वथा वश में की हुई होती हैं, उसकी बुद्धि स्थिर होती है। 'बाहु' कार्यक्षेत्र का प्रतीक है। भगवान 'महाबाहु' एवं 'आजानुबाहु' कहे जाते हैं। वे बिना हाथ-पैर के सर्वत्र कार्य करते हैं। उनमें जो प्रवेश पाता है या जो उसी भगवत्ता की ओर