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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1026, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1026

✻ निर्वाण प्रकरण ✻ २१७

कि यह मृतक समान है, इस मरे को क्या मारना है? यद्यपि यह मेरा शत्रु है तो भी मैं इसे नहीं मारूँगा, इसके मारने से मेरा क्या पुरुषार्थ सिद्ध होगा? इसलिये जैसे स्वर्ग के द्वार को तोड़कर दैत्य वहाँ प्रवेश करते हैं, वैसे ही जञ्जीर तोड़कर वह हाथी वन में गया और महावत हाथी को, गया देख उठ बैठा और अपने स्वभाव में स्थित हुआ।

वह फिर हाथी के पीछे चला और हाथी को ढूँढ़ लिया। जैसे चन्द्रमा को राहु खोज लेता है, वैसे ही वन में हाथी को उसने खोज लिया। तब क्या देखता है कि वह वृक्ष के नीचे सोया पड़ा है। जैसे संग्राम को जीतकर सूरमा निश्चिन्त सोता है, वैसे ही हाथी को निश्चिन्त सोया पड़ा देख महावत ने विचार किया कि इसको वश में करना चाहिए। यह विचार उसने यह उपाय किया कि वन के चारों ओर खाई बनाई और खाई के ऊपर कुछ तृण और घाम डाली। जैसे शरत्काल के आकाश में बादल देखने भर को होता है, वैसे ही तृण और घाम खाई के ऊपर देखने भर को देख पड़ती थी। निदान जब किसी समय हाथी उठकर चला और खाई के बीच गिर पड़ा, तब महावत ने हाथी के निकट आ उसे जञ्जीरों में बाँधा। तब वह हाथी बड़े दुःख को प्राप्त हुआ। जो तप करके वन में दुःख पाता है, उसने भविष्य का विचार नहीं किया। अज्ञानी को भविष्य का विचार नहीं होता, इसी से वह दुःख पाता है। हे राजन्! यह जो मणि और हाथी के आख्यान तुमको मैंने सुनाये हैं, उनको जब तुम समझ लोगे तब आगे मैं उपदेश करूँगा।

इति श्रीयो० नि० हस्तिआख्यानवर्णनं नाम सप्ततितमसर्गः॥ ७० ॥

इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे राम! जब देवपुत्र ने ऐसे कहा, तब राजा बोला, हे देवपुत्र! यह दो आख्यान जो तुमने कहे हैं, सो तुम्हीं जानते हो, मैं तो कुछ नहीं समझा। इससे तुम्हीं इन्हें समझाकर कहो। देवपुत्र ने कहा, हे राजन्! तुम शास्त्र के अर्थ में तो बहुत चतुर हो और सब अर्थों के ज्ञाता हो, परन्तु स्वरूप में तुम्हारी स्थिति नहीं है। इससे जो वचन में कहता हूँ, उसे बुद्धि से ग्रहण करो। हस्ती क्या है और