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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1025, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1025

२१६ ✴ योगवाशिष्ठ ✴

उठाकर अपने घर ले आया और उसे ही चिन्तामणि मान लिया । जैसे मोह में जीव असत् को सत् और रज्जू को सर्प जानता है, जैसे दृष्टिदोष में दो चन्द्रमा देख पड़ते हैं और मनुष्य शत्रु को मित्र और विष को अमृतरूप जानता है, वैसे ही उसने काँच को चिन्तामणि जान कर जो कुछ अपने पास धन था, वह भी लुटा दिया और कुटुम्ब का त्यागकर कहने लगा कि मुझे चिन्तामणि प्राप्त हुई है, अब कुटुम्ब में क्या प्रयोजन है ? निदान घर से निकलकर वन में गया और वहाँ उसने बड़े दुःख पाये क्योंकि काँच की मणि में कुछ प्रयोजन नहीं सिद्ध हुआ । ऐसे ही हे राजन् ! मूर्ख लोग विद्यमान वस्तु को त्यागते हैं, उसका माहात्म्य नहीं जानते और उसको नहीं पाते ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे चिन्तामणि वृत्तान्तवर्णनं नाम नवषष्टितमस्सर्गः ॥ ६९ ॥

देवपुत्र बोले, हे राजन् ! इसी प्रकार एक और आख्यान कहता हूँ, वह भी सुनो । मन्दराचल पर्वत के वन में सब पहाड़ियों का राजा एक हाथी रहता था । वह मानो स्वयं विन्ध्याचल था, जिसको अगस्त्य मुनि ने बढ़ने से रोका था । उसके बड़े-बड़े दाँत इन्द्र के वज्र की तरह तीक्ष्ण थे और प्रलयकाल के वड़वानल के समान वह प्रकाशमान था । वह ऐसा बलवान था कि सुमेरु पर्वत को दाँतों से उठा ले । निदान उस हस्ती को एक महावत ने जैसे राजा बलि को विष्णु भगवान् ने छल करके बाँधा था, लोहे की जञ्जीर में बाँधा, और वह आम पास के एक वृक्ष पर चढ़ बैठा कि कूदकर हाथी के ऊपर चढ़ बैठूँ । वह हाथी जञ्जीर में महाकष्ट को प्राप्त हुआ । उसने इतना दुःख पाया जिसका वर्णन नहीं हो सकता । तब हाथी के मन में विचार आया कि जो अब मैं बल में जञ्जीर न तोड़ूँगा तो कैसे छूटूँगा ? यह सोचकर उसने उस जञ्जीर को बल करके तोड़ दिया । तब वृक्ष पर जो महावत बैठा था, वह गिरकर हाथी के पैरों के आगे आ पड़ा और भय को प्राप्त हुआ । जैसे वृक्ष का फल पवन से गिर पड़ता है, वैसे ही महावत भय में गिर पड़ा । जब इस प्रकार महावत गिरा, तब हाथी ने विचार किया