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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1024, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1024

☸ निर्वाण प्रकरण ☸

२१५

करूँगा। जैसे शास्त्र और वेद के कहे कर्म करता हूँ, वैसे ही तुम्हारा कहना करूँगा। यह मेरा नियम है, जो तुम आज्ञा करोगे सो करूँगा। तब देवपुत्र ने कहा, हे राजन्! प्रथम तो तुम ऐसा निश्चय करो कि इन वचनों से मेरा कल्याण होगा। फिर ऐसे जानो कि पिता जो पुत्र को सिखाता है, सो शुभ ही होता है। मैं जो तुमसे कहूँगा, सो शुभ ही कहूँगा—उससे तुम्हारा कल्याण होगा। इसलिए निश्चय जानो कि इन वचनों से तुम्हारा कल्याण ही होगा। एक आख्यान जो पहले कभी हुआ है, कहता हूँ, उसे सुनो। एक पण्डित धन और गुणों से संपन्न था। वह सर्वदा चिन्तामणि के पाने की इच्छा करता था। इसके लिए शास्त्र में जैसे उपाय कहे हैं, वैसे ही करता था। जब कुछ काल व्यतीत हुआ, तब जैसे चन्द्रमा का प्रकाश होता है, वैसे ही प्रकाशवान चिन्तामणि उसे प्राप्त हुई। उसने उसे ऐसे निकट जाना कि हाथ से उठा लेगा। जैसे उदयाचल पर्वत के निकट चन्द्रमा उदय होता है, वैसे ही चिन्तामणि जब निकट आकर प्राप्त हुई, तब पण्डित के मन में विचार आया कि यह चिन्तामणि है अथवा कुछ और है? जो चिन्तामणि हो तो उठा लूँ और जो चिन्तामणि न हो तो किस निमित्त उठाऊँ? फिर कहा, उठा लेता हूँ, मणि ही होगी; फिर सोचा कि यह मणि नहीं है, क्योंकि मणि तो बड़े यत्न से प्राप्त होती है। मुझे सहज में क्यों प्राप्त होगी? इससे विदित होता है कि यह चिन्तामणि नहीं है। जो इस तरह आसानी से प्राप्त होती तो सब लोग धनी हो जाते।

जब ऐसे संकल्प-विकल्प कर पण्डित विचारने लगा और इससे उसके चित्त पर आवरण पड़ गया, तब मणि छिप गई; क्योंकि जो सिद्धियाँ हैं, उनका मान और आदर न करिये तो शाप देती हैं। जिस दिव्य वस्तु का कोई आवाहन करता है और उसका पूजन नहीं करता तो वह उसे त्याग जाती है। तब उसे बड़ा दुःख हुआ कि चिन्तामणि मेरे पास से चली गई। निदान वह फिर यत्न करने लगा। तब काँच की मणि उसका उपहास करने को उसके आगे आ पड़ी। उसको देखकर वह कहने लगा कि यह चिन्तामणि है। अबोध के कारण वह उसको

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