योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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ज्ञेय है। जो जानने योग्य है, वह जान लेने पर फिर वासना नहीं रहती। केवल स्वच्छ आप ही होता है। हे राजन्! तुम्हें अपने स्वरूप को ही जानना था। फिर तुम और जंजाल में किस निमित्त पड़े हो? आत्मज्ञान बिना और अनेक यत्न करोगे तो भी शान्ति नहीं प्राप्त होगी। जैसे पवन से रहित वृक्ष शान्तरूप होता है, और जब पवन होता है तब क्षोभ को प्राप्त होकर हिलता है, वैसे ही जब वासना निवृत्त होगी तब शान्तपद प्राप्त होगा और कोई क्षोभ न रहेगा। देवपुत्र ने जब ऐसे कहा, तब राजा ने कहा, हे भगवन्! तुम मेरे पिता हो, तुम्हीं गुरु हो और तुम्हीं कृतार्थ करनेवाले हो। मैंने वासना में बड़ा दुःख पाया है। जैसे किसी वृक्ष के पत्ते, डाल, फूल, फल सूख जावें और अकेला ठूँठ रह जाय, वैसे ही ज्ञान बिना मैं भी ठूँठ सा हो रहा हूँ। इसलिए कृपा करके मुझे शान्ति का मार्ग बताओ। देवपुत्र ने कहा, हे राजन्! तुम्हें त्याग करके सन्तों का संग करना चाहिए था और यह प्रश्न करना चाहिए था कि बन्धन क्या है और मोक्ष क्या है? मैं क्या हूँ और यह संसार क्या है? संसार की उत्पत्ति किससे होती है और वह लीन कैसे होता है? तुमने यह क्या किया कि सन्तों का नहीं, ठूँठ वन का आकर सेवन किया। अब तुम सन्तजनों का संग करके निर्वासनिक बनो। ब्रह्मादिक ने भी कहा है कि जीव जब निर्वासनिक होता है, तब सुखी होता है। फिर राजा ने कहा, हे भगवन्! तुम्हीं सन्त हो और तुम्हीं मेरे गुरु और पिता हो। जिस प्रकार मुझे शान्ति हो सो कहो।
तब कुम्भज ने कहा, हे राजन्! मैं तुम्हें उपदेश करता हूँ, तुम उसे हृदय में धारण करोगे। जो तुम उसे हृदय में न धारण करोगे तो मेरे कहने से क्या होता है? जैसे डाल पर कौआ हो और शब्द भी सुने तो भी वह अपने कौए के स्वभाव को नहीं छोड़ता, वैसे ही जो तुम भी कौए की तरह हो तो मेरा कहना व्यर्थ है? जैसे तोते को जो सिखाते हैं, उसे वह सीखता है वैसे ही तुम भी हो जाओ।
शिखिध्वज ने कहा, हे भगवन्! जो तुम आज्ञा करोगे सो मैं