योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ २१३
अब इसी वन में आ बैठा हूँ, तो भी मुझे शान्ति नहीं प्राप्त है। तब देव-पुत्र ने कहा, हे राजऋषि ! तुमने राज्य का तो त्याग किया, पर तपरूपी गढ़े गिर पड़े। यह तुमने क्या किया ? जैसे पृथ्वी का कीड़ा फिर पृथ्वी में ही रहता है, वैसे ही तुम एक गढ़े को त्यागकर दूसरे गढ़े में आ पड़े हो और जिस निमित्त राज्य का त्याग किया, उसको नहीं जाना। यहाँ आकर तुमने जो एक लाठी, मृगछाला और फूल रखे हैं, इनसे तो शान्ति नहीं मिलती। इससे अपने स्वरूप में जागो; जब स्वरूप में जागोगे, तब सब दुःख निवृत्त होंगे। इसी विषय पर एक समय मैंने ब्रह्माजी से प्रश्न किया था कि हे पितामह ! कर्म श्रेष्ठ है अथवा ज्ञान श्रेष्ठ है—दोनों में कौन श्रेष्ठ है ? जो मेरे लिए कर्तव्य हो सो कहिए। तब पितामह ने कहा कि ज्ञान के पाने से फिर कोई दुःख नहीं रहता और ज्ञान सब आनन्दों का आनन्द है। अज्ञानी के लिए कर्म श्रेष्ठ है; क्योंकि वे पापकर्म करेंगे तो नरक को प्राप्त होंगे। यद्यपि तप और दान करने से स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती, तो भी अज्ञानी के लिए कर्म ही श्रेष्ठ है, जिससे नरक न भोगकर वह स्वर्ग में रहे। जैसे कम्बल से रेशम का वस्त्र श्रेष्ठ है, परन्तु यदि रेशम का न पाइये तो कम्बल ही भला, वैसे ही ज्ञान रेशम की तरह है और तप कर्म कम्बल के समान है—कर्म से शान्ति नहीं होती। इससे हे राजन् ! तुम क्यों इस गढ़े में पड़े हो ? आगे तुम राज्यवासी थे और अब वनवासी हुए। यह तुमने क्या किया कि मूर्खता-वश अज्ञान में पड़े रहे। जब तक तुम्हें क्रिया का भान होता है कि मैं यह करूँ, तब तक प्रमाद है। इससे दुःख निवृत्त न होगा। निर्वासनिक होकर अपने स्वरूप के विषय में जागो निर्वासनिक होना ही मुक्ति है और वासना-सहित होना ही बन्धन है। निर्वासनिक होना ही पुरुषार्थ है। जीव जब तक वासना-सहित है, तब तक अज्ञानी है। जब निर्वासनिक हो तब ज्ञेयरूप होता है। सदा ज्ञेय की भावना करनेवाला को निर्वासनिक और ज्ञेय आत्मस्वरूप को कहते हैं। उसको जानकर फिर कोई इच्छा नहीं रहती। केवल चिन्मात्रपद स्थित होने का नाम