योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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नहीं होता, इसमें कहिये कि आपकी उत्पत्ति कैसे हुई है ? देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! जो कोई प्रश्न करता है, उसका बड़े लोग निरादर नहीं करते। इसमें तुम जो पूछते हो सो मैं कहता हूँ। हे राजर्षि ! वह वीर्य नारदमुनि ने एक मटकी में रक्खा और उस पर दूध डाला। वह मटकी स्वर्ण की थी, जिसमें उज्ज्वल चमक थी। उस मटकी को पूर्णकर वीर्य को एक कोने की ओर किया और फिर मन्त्रों का उच्चारण किया और आहुति देकर भली प्रकार पूजन किया। जब एक मास व्यतीत हुआ तब मटकी में बालक प्रकट हुआ—जैसे चन्द्रमा क्षीरसमुद्र में निकला हो। उस बालक को लेकर नारद आकाश को उड़े। उसे अपने पिता ब्रह्माजी के पास ले आये और नमस्कार किया। वही बालक मैं हूँ। तब मुझको पितामह ने गोद में बिठा लिया और आशीर्वाद देकर कहा कि तू सर्वज्ञ होगा और शीघ्र ही अपने स्वरूप को प्राप्त होगा। कुम्भ में मैं उपजा था, इसलिए उन्होंने मेरा नाम कुम्भज रक्खा। मैं नारदजी का पुत्र और ब्रह्माजी का पौत्र हूँ। सरस्वती मेरी माता है। गायत्री मेरी मौसी है। मैं सर्वज्ञ हूँ। तब राजा ने कहा, हे देवपुत्र ! तुम सर्वज्ञ हो, यह तुम्हारे वचनों से मैं जानता हूँ। देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! जो तुमने पूछा सो मैंने कहा। अब कहो, तुम कौन हो; क्या कर्म करते हो और यहाँ किस निमित्त आये हो ? राजा ने कहा, हे देवपुत्र ! आज मेरे बड़े भाग्य उदय हुए हैं जो तुम्हारा दर्शन हुआ। तुम्हारा दर्शन बड़े भाग्य से प्राप्त होता है। यज्ञ और तप से भी तुम्हारा दर्शन श्रेष्ठ है। देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! अपना वृत्तान्त कहो। राजा ने कहा, हे देवपुत्र ! मैं राजा हूँ, शिखिध्वज मेरा नाम है। संसार दुःखदायक भासित हुआ। बारम्बार जन्म और मरण इसमें देख पड़ता है, इसमें राज्य को त्यागकर यहाँ बन में तप करने लगा हूँ। तुम त्रिकालज्ञ हो और जानते हो, तथापि तुम्हारे पूछने में कुछ कहना चाहिए। मैं त्रिकाल संध्या और जप करता हूँ तो भी मुझे शान्ति नहीं मिली। इसलिए जिसमें मेरे दुःख निवृत्त हों वह उपाय कहिये। हे देवपुत्र ! मैंने बहुत तीर्थ किये हैं और बहुत देशों और स्थानों में घूमा हूँ। पर