योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1020, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❉ निर्वाण प्रकरण ❉ २११
अज्ञान का सम्बन्ध है, तब तक दुःख नहीं निवृत्त होता । तब राजा ने कहा कि वीर्य जो गिरता है सो कैसे निवृत्त होता है ? देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! जब चित्त वासना से क्षोभ को प्राप्त होता है; तब नाड़ियों में भी क्षोभ होता है और वे अपने स्थानों को त्यागने लगती हैं । उर्मी अवस्था में वीर्यवाली नाड़ी से भी स्वाभाविक ही वीर्य नीचे को चला आता है । फिर राजा ने पूछा, हे देवपुत्र ! स्वाभाविक किसे कहते हैं ? देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! आदि शुद्ध चैतन्य परमात्मा में जो स्फुरण हुआ है, उस क्षणमात्र शक्ति के उत्थान से प्रपञ्च बन गया है । इसमें आदि नियम यह हुआ है कि यह घट है, यह पट है, यह अग्नि है, इसमें उष्णता है, यह जल है, इसमें शीतलता है । वैसे ही यह भी नियम है कि वीर्य ऊपर से नीचे को आना है । जैसे पर्वत से पत्थर गिरता है तो नीचे को चला आता है, वैसे ही वीर्य भी नीचे को आता है । तब राजा ने प्रश्न किया कि हे देवपुत्र ! जीव को दुःख-सुख कैसे होता है और दुःख-सुख का अभाव कैसे होता है ? देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! यह जीव कुण्डलिनी शक्ति में स्थित होकर दृश्य में जो चारों अन्तःकरण, इन्द्रियाँ और देह हैं, उनमें अभिमान करके इनके दुःख से दुःखी और इनके सुख में सुखी होता है । तब जैसा-जैसा आगे प्रतिबिम्ब होता है, वैसा-वैसा दुःख-सुख भासित होता है—जैसे शुद्ध मणि में प्रतिबिम्ब पड़ता है । यह सब अज्ञान से होता है और ज्ञान में इनका अभाव हो जाता है । जब ज्ञानरूप का आवरण करके आगे पटल होता है, तब प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता । देहादिक के अभिमान से रहित होने को ज्ञान कहते हैं अर्थात् यह ज्ञान कि न देहादिक है और न मैं इनमें कुछ करता हूँ । जब ऐसे निश्चय हो, तब दुःख-सुख का भान नहीं होता; क्योंकि संसार का दुःख-सुख भावना से होता है । जब वासना से रहित हुआ, तब दुःख-सुख भी सब नष्ट हो जाते हैं । जैसे जब वृक्ष ही जल जाता है, तब पत्ते, फूल, फल कहाँ रहे ? वैसे ही अज्ञानरूप वासना के दग्ध होने पर दुःख-सुख कहाँ रहे ? फिर राजा ने कहा, हे भगवन् ! तुम्हारे वचन सुनकर मैं तृप्त नहीं होता, जैसे मेघ का शब्द सुनकर मोर तृप्त