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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1019, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1019

२१ ❊ योगवाशिष्ट ❊

कहकर मेरा संशय निवृत्त कीजिये ? तब देवपुत्र ने कहा, हे राजन ! एक समय नारदमुनि सुमेरु पर्वत की कन्दरा में, जहाँ आश्चर्य के देने-वाले वृक्ष मञ्जरियों, फूलों और फलों से पूर्ण थे और ब्राह्मणों की कुटी बनी हुई थी, समाधि लगाकर बैठे । वहाँ गङ्गा का प्रवाह बहता था और सिद्धों के सिवा और जीवों की गति न थी । इससे नारद मुनि वहाँ कुछ काल समाधि में स्थित रहे । जब समाधि खोली, तब उन्होंने आभूषणों का शब्द सुना और मन में महाआश्चर्य माना कि यहाँ तो कोई नहीं आ सकता, यह भूषणों का शब्द कहाँ से आया ? तब उठकर देखने लगे कि गङ्गा के प्रवाह में उर्वशी आदि महासुन्दरी अप्सराएँ वस्त्रों को उतारे हुए स्नान कर रही हैं । जब उनको नारदजी ने देखा तो उनका विवेक जाता रहा और वीर्य निकलकर उनके पास जो एक सुन्दर केल था, उसके पत्ते पर स्थित हुआ । इतना सुनकर शिखिध्वज ने कहा, हे देवपुत्र ! ऐसे ब्रह्मवेत्ता और सर्वज्ञ मननशील योगी नारद-मुनि का वीर्य किस निमित्त गिरा ? देवपुत्र ने कहा, हे राजन ! जब तक शरीर है; तब तक अज्ञानी और ज्ञानी के शरीरों का स्वभाव निवृत्त नहीं होता । परन्तु एक भेद है । ज्ञानवान् को यदि दुःख प्राप्त होता है तो वह दुःख नहीं मानता और यदि सुख प्राप्त होता है तो सुख नहीं मानता और उसमें हर्षित नहीं होता । और अज्ञानी को यदि सुख-दुःख प्राप्त होते हैं तो वह हर्ष-शोक करता है । जैसे श्वेत वस्त्र पर केसर का रङ्ग शीघ्र ही चढ़ जाता है, वैसे ही अज्ञानी को दुःख-सुख का रङ्ग शीघ्र ही चढ़ जाता है । और जैसे मोम के वस्त्रों को जल का स्पर्श नहीं होता, वैसे ही ज्ञानवान् को दुःख-सुख का स्पर्श नहीं होता । जिसके अन्तः-करणरूपी वस्त्र को ज्ञानरूपी मोम नहीं चढ़ा, उसको दुःख-सुखरूप जल स्पर्श कर जाता है । दुःख की और सुख की नाड़ी भिन्न-भिन्न है । जब सुख की नाड़ी में जीव स्थित होता है, तब कोई दुःख नहीं देखता और जब दुःख की नाड़ी में स्थित होता है, तब सुख नहीं देखता । अज्ञानी को कोई दुःख का स्थान है और कोई सुख का स्थान है और ज्ञानी को एक आभासमात्र दिखाई देता है—उसे बन्धन नहीं होता । जब तक