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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1018, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1018

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २०६

जीवों की गति नहीं। बड़ा आश्चर्य है कि महावैताल की तरह यह रात्रि को चला आया है। अज्ञान महादुष्ट है कि ऐसा राजा तप में लगा है और स्वरूप के प्रमाद से जड़ है। अब ऐसा हो कि किसी प्रकार यह अपने स्वरूप को प्राप्त हो। परन्तु मेरे इस शरीर से इसको ज्ञान न उपजेगा, क्योंकि प्रथम तो इसको यह अभिमान होगा कि यह मेरी स्त्री है और फिर कहेगा कि मैंने इसी के निमित्त राज्य छोड़ा है और यह फिर मुझे दुःख देने आई है। इससे मैं ब्रह्मचारी का शरीर धारण करूँ। ऐसा विचार करके उसने शीघ्र ही ब्रह्मचारी का शरीर धारण किया। हाथ में रुद्राक्ष की माला, कमण्डलु और गले में मृगछाला धारण किया। जैसे सदाशिव के मस्तक पर चन्द्रमा विराजता है, वैसे ही सुन्दर विभूति लगा और श्वेत यज्ञोपवीत धारणकर पृथ्वी के मार्ग से राजा के निकट जा पहुँची। राजा उसे देखकर आगे से उठ खड़ा हुआ और नमस्कार कर चरणों पर फूल चढ़ाये। फिर अपने स्थान पर बैठाकर कहने लगा—हे देवपुत्र! आज मेरे बड़े भाग्य हैं जो आपका दर्शन हुआ। कृपा करके कहिए कि आप किसलिए आये हैं? देव-पुत्र बोले, हे राजन्! हम बड़े-बड़े पर्वत देखते और तीर्थ करते आये हैं, परन्तु जैसी भावना तुममें देखी है, वैसी किसी में नहीं देखी। तुमने बड़ा तप किया है और तुम इन्द्रियजित देख पड़ते हो। मैं जानता हूँ कि तुम्हारा तप खड्ग की धार सा तीक्ष्ण है, इससे तुम धन्य हो, तुम्हें नमस्कार है। परन्तु हे राजन्! आत्मयोग के निमित्त भी कुछ तप किया है, अथवा नहीं? तब राजा ने जो फूलों की माला देवपूजन के निमित्त रक्खी थी, वह देवपुत्र के गले में डाली और पूजा करके कहा, हे देव-पुत्र! तुम ऐसों का दर्शन दुर्लभ है और अतिथि का पूजन देवता से भी अधिक है। हे देवपुत्र! आपके अङ्ग बहुत सुन्दर देख पड़ते हैं ऐसे ही मेरी स्त्री के अङ्ग थे। नख से शिखा पर्यन्त तुम्हारे वही अङ्ग देख पड़ते हैं। परन्तु आप तो तपस्वी हैं और आपकी मूर्ति शान्ति के लिए हुई है। मैं कैसे कहूँ कि तुम वही हो। इससे हे देवपुत्र! आप किसके पुत्र हैं; यहाँ किस निमित्त आये हैं और आगे कहाँ जायँगे यह