योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1017, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें२०८ ✴ योगवाशिष्ठ ✴
दोष) परिपक्व नहीं हुए, इससे इसका मार्ग न रोकना चाहिए। निदान रानी फिर अपने घर आई और शय्या पर शयनकर बड़ी प्रसन्नता को प्राप्त हुई। जब रात्रि व्यतीत हुई, तब मन्त्रियों से कहने लगी कि राजा एक तीर्थ करने गये हैं और दर्शन करके फिर आवेंगे। तुम अपने कार्य करते रहो। यह सुन मन्त्री अपने काम करने लगे। इसी प्रकार रानी ने आठ वर्ष तक राज्य किया और प्रजा को सुख दिया। जैसे माली कमलों और क्यारियों को पालता है, वैसे ही रानी ने प्रजा को पाल-कर सुख दिया। उधर राजा को आठ वर्ष तप करते बीते और उसके अङ्ग दुर्बल हो गये। इधर रानी ने राज्य किया। पर जैसे भँवरा और ठौर हो, और भँवरा और ठौर हो, वैसे ही समय व्यतीत हुआ। तब रानी ने विचार किया कि राजा अब मेरे वचनों का अधिकारी हुआ होगा; क्योंकि अब उसका अन्तःकरण तप करके शुद्ध हो गया है। इससे अब राजा को देखिये। निदान रानी वहाँ से उड़कर आकाश को गई और इन्द्र के नन्दनवन को देख वहाँ के दिव्यपवन का स्पर्श हुआ तो उसके चित्त में आया कि मुझे भर्ता कब मिलेगा? फिर कहने लगी कि बड़ा आश्चर्य है? मैं तो सत्पद को प्राप्त हुई थी तो भी मेरा मन चलायमान हुआ है तो और जीवों की क्या बात है। वहाँ से भी चली तो आगे कमल फूल देखकर कहने लगी कि मुझे भर्ता कब मिलेगा? म तो कामातुर हुई हूँ। फिर मन में कहने लगी कि हे दुष्ट मन! तू तो सत्पद को प्राप्त हुआ था; तेरा भर्ता आत्मा है, अब तू मिथ्या पदार्थों की अभिलाषा क्यों करता है? मालूम होता है कि जब तक देह है, तब तक देह के स्वभाव भी साथ रहते हैं, इससे यह अवस्था प्राप्त हुई है, तभी मन चलायमान हुआ है। जब मेरा यह हाल है, तब इतर जीवों की क्या बात है। तब रानी मेघ, बिजली, पर्वतों, नदियों, समुद्र और भयानक स्थानों को लाँघकर मन्दराचल पर्वत के पास वन में पहुँची और देखने लगी कि मेरा भर्ता कहाँ है? समाधि में स्थित होकर उसने देखा कि अमुक स्थान में राजा बैठा है तप से महा दुर्बल शरीर हो गया है। वह ऐसे स्थान में है जहाँ और