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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1016, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1016

❊ निर्वाण प्रकरण ❊

२०७

शब्द सुनता आगे चला तो उसके आगे और वन मिला। उसको भी लाँघ गया। आठ पहर चलकर राजा एक जगह जा पहुँचा। जब सूर्य उदय हुआ तब स्नान करके संध्यादिक कर्म किये और वृक्षों के फल भोजनकर फिर वहाँ से आगे चला। इस डर से कि कोई कहीं पीछे से आकर मुझे न रोके, बड़े वेग से चला। बड़े-बड़े पहाड़, नदियाँ और वन नाँघकर बारह दिन पश्चात् मन्दराचल पर्वत के निकट जा पहुँचा। एक वन में जाकर ठहरा और स्नान करके कुछ भोजन किया। मेघ और छाया से रक्षा के निमित्त उसने वहाँ एक झोंपड़ी बनाई और पात्र बनाकर उसमें फूल और फल रक्खे। जब प्रातःकाल होता तब स्नान करके पहर भर जप करता था और फिर देवताओं की पूजा के निमित्त फूल चुनता था। दो पहर ऐसे व्यतीत करता था। जब तीसरा पहर होता, तब फल भोजन करता था। चौथे पहर फिर संध्या और जप करता था। कुछ काल रात्रि को शयन करता और बाकी जप में बिताता था। इसी प्रकार काल को व्यतीत करता था। हे राम! राजा की तो यह अवस्था हुई, अब रानी की अवस्था सुनो। जब अर्धरात्रि के पीछे रानी जगी तो क्या देखा कि राजा वहाँ नहीं है और शय्या खाली पड़ी है। रानी ने सहेलियों को जगाकर कहा, बड़े कष्ट की बात है कि राजा वन को निकल गये। वह बड़े भयानक वन में जायँगे। ऐसे कहकर मन में विचार किया कि राजा को देखना चाहिये। इसलिए योग में स्थित होकर आकाश को उड़ी और आकाश की तरह देह को अन्तर्धान किया। जैसे योगेश्वरी भवानी उड़ती हैं, वैसे ही उड़ी और आकाश में स्थित होकर देखा कि राजा चला जा रहा है। रानी के मन में आया कि इसका मार्ग रोकूँ, पर एक क्षणमात्र स्थित होकर भविष्यत् को विचारने लगी कि राजा का और मेरा संयोग नीति में कैसे रचा है। विचार करके देखा कि राजा का और मेरा मिलाप होने में अभी बहुत काल बाकी है। अवश्य मिलाप होगा और मेरे उपदेश से राजा जागेगा, परन्तु यह सब बहुत काल उपरान्त होगा। अभी इसके कषाय (मन के