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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1015, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1015

२०६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

अटकाना। तब रानी ने कहा, हे राजन्! अभी तेरी कितनी अवस्था है, जो तुम वन को जाते हो? अब तो हमारे राज्य भोगने का समय है। जैसे वसन्त में फल शोभा पाते हैं और शरदकाल में नहीं सोहते, वैसे ही हम भी जब वृद्ध होंगे, तब वन को जायेंगे और वन ही में शोभा पावेंगे। जैसे बन के फूल श्वेत होते हैं, वैसे ही जब हमारे केश श्वेत होंगे, तब शोभा पावेंगे—अभी तो राज्य करो। हे राम! इस प्रकार रानी ने कहा, पर राजा का चित्त वैराग्य ही में रहा और वह रानी का कहना चित्त में न लाया। जैसे चन्द्रमा बिना कमलिनी शान्ति नहीं पाती, वैसे ही ज्ञान बिना राजा को शान्ति न हुई। परन्तु वैराग्य करके फिर कहने लगा—हे रानी! अब मुझे न रोक। अब राज्य मुझको फीका लगता है, इसलिए में वन को जाता हूँ, यहाँ नहीं ठहर सकता। जो तुम कहो कि में यहाँ तेरी सेवा-टहल करती थी, वन में कौन करेगा, तो पृथ्वी ही मेरी सेवा टहल करेगी, वन की वीथियाँ स्त्रियाँ होंगी; मृगों के बालक पुत्र होंगे, आकाश हमारा वस्त्र और फूल के गुच्छे भूषण होंगे। जब दूसरी रात्रि हुई और राजा वहाँ से चला तो रानी और सेना भी पीछे चली और कोट के बीच सब स्थित हुए। राजा और रानी ने विश्राम किया—जैसे भँवर भँवरी सोते हैं, और सेना और सहेलियाँ भी सब सो गईं। सब पत्थर की शिला सदृश निद्रा से जड़ हो गये। जब आधी रात्रि व्यतीत हुई तो राजा जगा और देखा कि सब सो गये हैं। निदान शय्या में उठ; रानी के वस्त्र एक ओर करके और हाथ में खङ्ग में लेकर निकला। जैसे क्षीरसमुद्र में विष्णु भगवान् लक्ष्मी के पास में उठते हैं, वैसे ही उठ, सब लोगों को लाँघता कोट के दरवाजे पर आया तो देखा आधे मनुष्य जागते थे, और आधे सो गये थे। उन्होंने जब राजा को देखा तब राजा ने कहा, द्वारपालो! तुम यहीं बैठे रहो; में अकेला ही तीर्थयात्रा को जाता हूँ। इतना कह राजा बड़े वेग से चला गया और बाहर निकलकर कहा, हे राजलक्ष्मी! तुझको प्रणाम है। अब में वन को चला। फिर एक वन में पहुँचा, जहाँ सिंह, सर्प तथा और भयानक जीव थे। उनके