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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1014, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1014

* निर्वाण प्रकरण * २०५

फिर आठ निकलीं। जब तीन दिन और ढूँढ़ते बीते, तब चन्द्रमा की नाईं चिन्तामणि प्रकट देखी और उसे लेकर अपने घर आया और अति हर्षित हुआ। हे राम! वैसे ही गुरु और शास्त्रों में 'तत्त्वमसि' और 'अहं ब्रह्मास्मि' का पाना कौड़ियों का खोजना है, और आत्मा चिन्तामणि रूप है। परन्तु जैसे कौड़ियों की खोज में उसने चिन्तामणि बिना खोजे नहीं पाई, वैसे ही गुरु और शास्त्रों से आत्मपद मिलता है—गुरु और शास्त्रों के बिना नहीं मिलता। धन, तप और कर्म से आत्मा नहीं मिलता, केवल अपने आप खोजने से पाया जाता है। हे राम! जब शिखरध्वज चूड़ाला के पास से उठकर स्नान को गया, तब राजा के मन में वैराग्य उपजा कि यह संसार मिथ्या है। हमने बहुत भोग भोगे तो भी हृदय को शान्ति न हुई। और इन भोगों का परिणाम दुःखदायक है। जब मन में ऐसा विचार उपजा, तब राजा ने गऊ, पृथ्वी, सुवर्ण, मन्दिर और दूसरी सामग्री बहुत दान की और सब ऐश्वर्य के पदार्थ ब्राह्मणों, गरीबों और अतिथियों को अधिकार के अनुसार बाँट दिये। रानी ने भी ब्राह्मणों और मन्त्रियों से कहा कि राजा को तुम यही उपदेश दिया करो कि ये भोग मिथ्या हैं, इनमें कुछ सुख नहीं। आत्मसुख बड़ा सुख है, जिसके पाने से जन्म-मरण से मुक्ति होती है। इसी प्रकार राजा ब्राह्मणों से सुने और अपने मन में भी वैराग्य उपजाता था, इस कारण विचारे कि मैं इस संसारदुःख से रहित हो जाऊँ; यह संसार बड़ा दुःखरूप है और इसमें सदा जन्म-मरण है। निदान राजा के मन में आया कि में तीर्थों को जाऊँ और स्नान करूँ। इसलिए तीर्थों को चला और स्नान, दान करता हुआ देवता, तीर्थों और सिद्धों के दर्शन करके गृह को आया। रात्रि के समय रानी के साथ शयन किया तो रानी से कहा कि हे अङ्गने! अब मैं वन को तप करने के लिए जाता हूँ, क्योंकि ये भोग मुझे दुःखदायक जान पड़ते हैं और राज्य भी वन की नाईं उजाड़ प्रतीत होता है। ये भोग हम बहुत काल पर्यन्त भोगते रहे, तो भी इनमें सुख नजर न आया, इसलिए में वन को जाता हूँ—मुझे न