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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1013, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1013

२०४ ✻ योगवाशिष्ट ✻

में तागा प्रवेश नहीं करता, वैसे ही चूड़ाला के उपदेश ने राजा को न वेधा। जबतक आप विचार न करे और उसमें दृढ़ अभ्यास न हो, तबतक यदि ब्रह्मा भी उपदेश करें तो उसको वह न वेधेगा, क्योंकि आत्मा आपही में जाना जाता है और इन्द्रियों का विषय नहीं है। अधिष्ठानरूप और स्वभावमात्र आत्मा आपही अपने को देखता है। वह किसी मन और इन्द्रियों का विषय नहीं है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! यदि आत्मा अपने को आपही में देखता है तो गुरु और शास्त्र किस निमित्त उपदेश करते हैं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! गुरु और शास्त्र जना देते हैं कि तेरा स्वरूप आत्मा है; परन्तु वे 'इदं' (यह है) करके नहीं दिखाते। विचारनेत्र से आत्मा अपने को आप ही देखता है; विचार से रहित होकर उसको नहीं देख सकता। जैसे किसी पुरुष को कोई आँखोंवाला आदमी चन्द्रमा दिखाता है, पर जो वह देखनेवाला आँखोंवाला होता है तो देख पाता है और मन्ददृष्टि होता है तो नहीं देख पाता, वैसे ही गुरु और शास्त्र आत्मा का रूप वर्णन करते हैं और दिखाते हैं, पर जब शिष्य विचारनेत्र से देखता है, तभी कहता है कि मैंने देखा और फिर अन्यों को दिखाने के योग्य होता है। हे राम! आत्मा किसी इन्द्रिय का विषय नहीं। वह अपना आप मूलरूप है। और इन्द्रियाँ कल्पित हैं। जो तुम कहों कि तुम भी तो इन्द्रिय से ही उपदेश करते हो तो जब इन्द्रियों का विस्मरण करो तो अपना मूल तुम्हें भासित होगा। हे राम! इस पर एक क्रान्त का इतिहास है, उसे सुनो। एक क्रान्त था, जिसके पास बहुत धन और अनाज था। परन्तु वह ऐसा कृपण था कि किसी को कुछ न देता था। धन की उसे ऐसी तृष्णा थी कि चाहता था कि किसी प्रकार मुझे चिन्तामणि मिले। इसी इच्छा से एक समय घर से बाहर निकल पृथ्वी की ओर देखता जाता था कि एक स्थान में पहुँचा जहाँ घास और भुस पड़ा था। उसे उसमें एक कौड़ी देखा पड़ी। वह उस कौड़ी को उठाकर देखने लगा कि कुछ और भी निकले। तो फिर दूसरी कौड़ी निकली। इसी प्रकार ढूँढ़ने-ढूँढ़ने उसे तीन दिन व्यतीत हुए, तब चार कौड़ी निकलीं और

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