योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
२०४ ✻ योगवाशिष्ट ✻
में तागा प्रवेश नहीं करता, वैसे ही चूड़ाला के उपदेश ने राजा को न वेधा। जबतक आप विचार न करे और उसमें दृढ़ अभ्यास न हो, तबतक यदि ब्रह्मा भी उपदेश करें तो उसको वह न वेधेगा, क्योंकि आत्मा आपही में जाना जाता है और इन्द्रियों का विषय नहीं है। अधिष्ठानरूप और स्वभावमात्र आत्मा आपही अपने को देखता है। वह किसी मन और इन्द्रियों का विषय नहीं है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! यदि आत्मा अपने को आपही में देखता है तो गुरु और शास्त्र किस निमित्त उपदेश करते हैं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! गुरु और शास्त्र जना देते हैं कि तेरा स्वरूप आत्मा है; परन्तु वे 'इदं' (यह है) करके नहीं दिखाते। विचारनेत्र से आत्मा अपने को आप ही देखता है; विचार से रहित होकर उसको नहीं देख सकता। जैसे किसी पुरुष को कोई आँखोंवाला आदमी चन्द्रमा दिखाता है, पर जो वह देखनेवाला आँखोंवाला होता है तो देख पाता है और मन्ददृष्टि होता है तो नहीं देख पाता, वैसे ही गुरु और शास्त्र आत्मा का रूप वर्णन करते हैं और दिखाते हैं, पर जब शिष्य विचारनेत्र से देखता है, तभी कहता है कि मैंने देखा और फिर अन्यों को दिखाने के योग्य होता है। हे राम! आत्मा किसी इन्द्रिय का विषय नहीं। वह अपना आप मूलरूप है। और इन्द्रियाँ कल्पित हैं। जो तुम कहों कि तुम भी तो इन्द्रिय से ही उपदेश करते हो तो जब इन्द्रियों का विस्मरण करो तो अपना मूल तुम्हें भासित होगा। हे राम! इस पर एक क्रान्त का इतिहास है, उसे सुनो। एक क्रान्त था, जिसके पास बहुत धन और अनाज था। परन्तु वह ऐसा कृपण था कि किसी को कुछ न देता था। धन की उसे ऐसी तृष्णा थी कि चाहता था कि किसी प्रकार मुझे चिन्तामणि मिले। इसी इच्छा से एक समय घर से बाहर निकल पृथ्वी की ओर देखता जाता था कि एक स्थान में पहुँचा जहाँ घास और भुस पड़ा था। उसे उसमें एक कौड़ी देखा पड़ी। वह उस कौड़ी को उठाकर देखने लगा कि कुछ और भी निकले। तो फिर दूसरी कौड़ी निकली। इसी प्रकार ढूँढ़ने-ढूँढ़ने उसे तीन दिन व्यतीत हुए, तब चार कौड़ी निकलीं और
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फिर आठ निकलीं। जब तीन दिन और ढूँढ़ते बीते, तब चन्द्रमा की नाईं चिन्तामणि प्रकट देखी और उसे लेकर अपने घर आया और अति हर्षित हुआ। हे राम! वैसे ही गुरु और शास्त्रों में 'तत्त्वमसि' और 'अहं ब्रह्मास्मि' का पाना कौड़ियों का खोजना है, और आत्मा चिन्तामणि रूप है। परन्तु जैसे कौड़ियों की खोज में उसने चिन्तामणि बिना खोजे नहीं पाई, वैसे ही गुरु और शास्त्रों से आत्मपद मिलता है—गुरु और शास्त्रों के बिना नहीं मिलता। धन, तप और कर्म से आत्मा नहीं मिलता, केवल अपने आप खोजने से पाया जाता है। हे राम! जब शिखरध्वज चूड़ाला के पास से उठकर स्नान को गया, तब राजा के मन में वैराग्य उपजा कि यह संसार मिथ्या है। हमने बहुत भोग भोगे तो भी हृदय को शान्ति न हुई। और इन भोगों का परिणाम दुःखदायक है। जब मन में ऐसा विचार उपजा, तब राजा ने गऊ, पृथ्वी, सुवर्ण, मन्दिर और दूसरी सामग्री बहुत दान की और सब ऐश्वर्य के पदार्थ ब्राह्मणों, गरीबों और अतिथियों को अधिकार के अनुसार बाँट दिये। रानी ने भी ब्राह्मणों और मन्त्रियों से कहा कि राजा को तुम यही उपदेश दिया करो कि ये भोग मिथ्या हैं, इनमें कुछ सुख नहीं। आत्मसुख बड़ा सुख है, जिसके पाने से जन्म-मरण से मुक्ति होती है। इसी प्रकार राजा ब्राह्मणों से सुने और अपने मन में भी वैराग्य उपजाता था, इस कारण विचारे कि मैं इस संसारदुःख से रहित हो जाऊँ; यह संसार बड़ा दुःखरूप है और इसमें सदा जन्म-मरण है। निदान राजा के मन में आया कि में तीर्थों को जाऊँ और स्नान करूँ। इसलिए तीर्थों को चला और स्नान, दान करता हुआ देवता, तीर्थों और सिद्धों के दर्शन करके गृह को आया। रात्रि के समय रानी के साथ शयन किया तो रानी से कहा कि हे अङ्गने! अब मैं वन को तप करने के लिए जाता हूँ, क्योंकि ये भोग मुझे दुःखदायक जान पड़ते हैं और राज्य भी वन की नाईं उजाड़ प्रतीत होता है। ये भोग हम बहुत काल पर्यन्त भोगते रहे, तो भी इनमें सुख नजर न आया, इसलिए में वन को जाता हूँ—मुझे न
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अटकाना। तब रानी ने कहा, हे राजन्! अभी तेरी कितनी अवस्था है, जो तुम वन को जाते हो? अब तो हमारे राज्य भोगने का समय है। जैसे वसन्त में फल शोभा पाते हैं और शरदकाल में नहीं सोहते, वैसे ही हम भी जब वृद्ध होंगे, तब वन को जायेंगे और वन ही में शोभा पावेंगे। जैसे बन के फूल श्वेत होते हैं, वैसे ही जब हमारे केश श्वेत होंगे, तब शोभा पावेंगे—अभी तो राज्य करो। हे राम! इस प्रकार रानी ने कहा, पर राजा का चित्त वैराग्य ही में रहा और वह रानी का कहना चित्त में न लाया। जैसे चन्द्रमा बिना कमलिनी शान्ति नहीं पाती, वैसे ही ज्ञान बिना राजा को शान्ति न हुई। परन्तु वैराग्य करके फिर कहने लगा—हे रानी! अब मुझे न रोक। अब राज्य मुझको फीका लगता है, इसलिए में वन को जाता हूँ, यहाँ नहीं ठहर सकता। जो तुम कहो कि में यहाँ तेरी सेवा-टहल करती थी, वन में कौन करेगा, तो पृथ्वी ही मेरी सेवा टहल करेगी, वन की वीथियाँ स्त्रियाँ होंगी; मृगों के बालक पुत्र होंगे, आकाश हमारा वस्त्र और फूल के गुच्छे भूषण होंगे। जब दूसरी रात्रि हुई और राजा वहाँ से चला तो रानी और सेना भी पीछे चली और कोट के बीच सब स्थित हुए। राजा और रानी ने विश्राम किया—जैसे भँवर भँवरी सोते हैं, और सेना और सहेलियाँ भी सब सो गईं। सब पत्थर की शिला सदृश निद्रा से जड़ हो गये। जब आधी रात्रि व्यतीत हुई तो राजा जगा और देखा कि सब सो गये हैं। निदान शय्या में उठ; रानी के वस्त्र एक ओर करके और हाथ में खङ्ग में लेकर निकला। जैसे क्षीरसमुद्र में विष्णु भगवान् लक्ष्मी के पास में उठते हैं, वैसे ही उठ, सब लोगों को लाँघता कोट के दरवाजे पर आया तो देखा आधे मनुष्य जागते थे, और आधे सो गये थे। उन्होंने जब राजा को देखा तब राजा ने कहा, द्वारपालो! तुम यहीं बैठे रहो; में अकेला ही तीर्थयात्रा को जाता हूँ। इतना कह राजा बड़े वेग से चला गया और बाहर निकलकर कहा, हे राजलक्ष्मी! तुझको प्रणाम है। अब में वन को चला। फिर एक वन में पहुँचा, जहाँ सिंह, सर्प तथा और भयानक जीव थे। उनके
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शब्द सुनता आगे चला तो उसके आगे और वन मिला। उसको भी लाँघ गया। आठ पहर चलकर राजा एक जगह जा पहुँचा। जब सूर्य उदय हुआ तब स्नान करके संध्यादिक कर्म किये और वृक्षों के फल भोजनकर फिर वहाँ से आगे चला। इस डर से कि कोई कहीं पीछे से आकर मुझे न रोके, बड़े वेग से चला। बड़े-बड़े पहाड़, नदियाँ और वन नाँघकर बारह दिन पश्चात् मन्दराचल पर्वत के निकट जा पहुँचा। एक वन में जाकर ठहरा और स्नान करके कुछ भोजन किया। मेघ और छाया से रक्षा के निमित्त उसने वहाँ एक झोंपड़ी बनाई और पात्र बनाकर उसमें फूल और फल रक्खे। जब प्रातःकाल होता तब स्नान करके पहर भर जप करता था और फिर देवताओं की पूजा के निमित्त फूल चुनता था। दो पहर ऐसे व्यतीत करता था। जब तीसरा पहर होता, तब फल भोजन करता था। चौथे पहर फिर संध्या और जप करता था। कुछ काल रात्रि को शयन करता और बाकी जप में बिताता था। इसी प्रकार काल को व्यतीत करता था। हे राम! राजा की तो यह अवस्था हुई, अब रानी की अवस्था सुनो। जब अर्धरात्रि के पीछे रानी जगी तो क्या देखा कि राजा वहाँ नहीं है और शय्या खाली पड़ी है। रानी ने सहेलियों को जगाकर कहा, बड़े कष्ट की बात है कि राजा वन को निकल गये। वह बड़े भयानक वन में जायँगे। ऐसे कहकर मन में विचार किया कि राजा को देखना चाहिये। इसलिए योग में स्थित होकर आकाश को उड़ी और आकाश की तरह देह को अन्तर्धान किया। जैसे योगेश्वरी भवानी उड़ती हैं, वैसे ही उड़ी और आकाश में स्थित होकर देखा कि राजा चला जा रहा है। रानी के मन में आया कि इसका मार्ग रोकूँ, पर एक क्षणमात्र स्थित होकर भविष्यत् को विचारने लगी कि राजा का और मेरा संयोग नीति में कैसे रचा है। विचार करके देखा कि राजा का और मेरा मिलाप होने में अभी बहुत काल बाकी है। अवश्य मिलाप होगा और मेरे उपदेश से राजा जागेगा, परन्तु यह सब बहुत काल उपरान्त होगा। अभी इसके कषाय (मन के
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दोष) परिपक्व नहीं हुए, इससे इसका मार्ग न रोकना चाहिए। निदान रानी फिर अपने घर आई और शय्या पर शयनकर बड़ी प्रसन्नता को प्राप्त हुई। जब रात्रि व्यतीत हुई, तब मन्त्रियों से कहने लगी कि राजा एक तीर्थ करने गये हैं और दर्शन करके फिर आवेंगे। तुम अपने कार्य करते रहो। यह सुन मन्त्री अपने काम करने लगे। इसी प्रकार रानी ने आठ वर्ष तक राज्य किया और प्रजा को सुख दिया। जैसे माली कमलों और क्यारियों को पालता है, वैसे ही रानी ने प्रजा को पाल-कर सुख दिया। उधर राजा को आठ वर्ष तप करते बीते और उसके अङ्ग दुर्बल हो गये। इधर रानी ने राज्य किया। पर जैसे भँवरा और ठौर हो, और भँवरा और ठौर हो, वैसे ही समय व्यतीत हुआ। तब रानी ने विचार किया कि राजा अब मेरे वचनों का अधिकारी हुआ होगा; क्योंकि अब उसका अन्तःकरण तप करके शुद्ध हो गया है। इससे अब राजा को देखिये। निदान रानी वहाँ से उड़कर आकाश को गई और इन्द्र के नन्दनवन को देख वहाँ के दिव्यपवन का स्पर्श हुआ तो उसके चित्त में आया कि मुझे भर्ता कब मिलेगा? फिर कहने लगी कि बड़ा आश्चर्य है? मैं तो सत्पद को प्राप्त हुई थी तो भी मेरा मन चलायमान हुआ है तो और जीवों की क्या बात है। वहाँ से भी चली तो आगे कमल फूल देखकर कहने लगी कि मुझे भर्ता कब मिलेगा? म तो कामातुर हुई हूँ। फिर मन में कहने लगी कि हे दुष्ट मन! तू तो सत्पद को प्राप्त हुआ था; तेरा भर्ता आत्मा है, अब तू मिथ्या पदार्थों की अभिलाषा क्यों करता है? मालूम होता है कि जब तक देह है, तब तक देह के स्वभाव भी साथ रहते हैं, इससे यह अवस्था प्राप्त हुई है, तभी मन चलायमान हुआ है। जब मेरा यह हाल है, तब इतर जीवों की क्या बात है। तब रानी मेघ, बिजली, पर्वतों, नदियों, समुद्र और भयानक स्थानों को लाँघकर मन्दराचल पर्वत के पास वन में पहुँची और देखने लगी कि मेरा भर्ता कहाँ है? समाधि में स्थित होकर उसने देखा कि अमुक स्थान में राजा बैठा है तप से महा दुर्बल शरीर हो गया है। वह ऐसे स्थान में है जहाँ और
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जीवों की गति नहीं। बड़ा आश्चर्य है कि महावैताल की तरह यह रात्रि को चला आया है। अज्ञान महादुष्ट है कि ऐसा राजा तप में लगा है और स्वरूप के प्रमाद से जड़ है। अब ऐसा हो कि किसी प्रकार यह अपने स्वरूप को प्राप्त हो। परन्तु मेरे इस शरीर से इसको ज्ञान न उपजेगा, क्योंकि प्रथम तो इसको यह अभिमान होगा कि यह मेरी स्त्री है और फिर कहेगा कि मैंने इसी के निमित्त राज्य छोड़ा है और यह फिर मुझे दुःख देने आई है। इससे मैं ब्रह्मचारी का शरीर धारण करूँ। ऐसा विचार करके उसने शीघ्र ही ब्रह्मचारी का शरीर धारण किया। हाथ में रुद्राक्ष की माला, कमण्डलु और गले में मृगछाला धारण किया। जैसे सदाशिव के मस्तक पर चन्द्रमा विराजता है, वैसे ही सुन्दर विभूति लगा और श्वेत यज्ञोपवीत धारणकर पृथ्वी के मार्ग से राजा के निकट जा पहुँची। राजा उसे देखकर आगे से उठ खड़ा हुआ और नमस्कार कर चरणों पर फूल चढ़ाये। फिर अपने स्थान पर बैठाकर कहने लगा—हे देवपुत्र! आज मेरे बड़े भाग्य हैं जो आपका दर्शन हुआ। कृपा करके कहिए कि आप किसलिए आये हैं? देव-पुत्र बोले, हे राजन्! हम बड़े-बड़े पर्वत देखते और तीर्थ करते आये हैं, परन्तु जैसी भावना तुममें देखी है, वैसी किसी में नहीं देखी। तुमने बड़ा तप किया है और तुम इन्द्रियजित देख पड़ते हो। मैं जानता हूँ कि तुम्हारा तप खड्ग की धार सा तीक्ष्ण है, इससे तुम धन्य हो, तुम्हें नमस्कार है। परन्तु हे राजन्! आत्मयोग के निमित्त भी कुछ तप किया है, अथवा नहीं? तब राजा ने जो फूलों की माला देवपूजन के निमित्त रक्खी थी, वह देवपुत्र के गले में डाली और पूजा करके कहा, हे देव-पुत्र! तुम ऐसों का दर्शन दुर्लभ है और अतिथि का पूजन देवता से भी अधिक है। हे देवपुत्र! आपके अङ्ग बहुत सुन्दर देख पड़ते हैं ऐसे ही मेरी स्त्री के अङ्ग थे। नख से शिखा पर्यन्त तुम्हारे वही अङ्ग देख पड़ते हैं। परन्तु आप तो तपस्वी हैं और आपकी मूर्ति शान्ति के लिए हुई है। मैं कैसे कहूँ कि तुम वही हो। इससे हे देवपुत्र! आप किसके पुत्र हैं; यहाँ किस निमित्त आये हैं और आगे कहाँ जायँगे यह
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कहकर मेरा संशय निवृत्त कीजिये ? तब देवपुत्र ने कहा, हे राजन ! एक समय नारदमुनि सुमेरु पर्वत की कन्दरा में, जहाँ आश्चर्य के देने-वाले वृक्ष मञ्जरियों, फूलों और फलों से पूर्ण थे और ब्राह्मणों की कुटी बनी हुई थी, समाधि लगाकर बैठे । वहाँ गङ्गा का प्रवाह बहता था और सिद्धों के सिवा और जीवों की गति न थी । इससे नारद मुनि वहाँ कुछ काल समाधि में स्थित रहे । जब समाधि खोली, तब उन्होंने आभूषणों का शब्द सुना और मन में महाआश्चर्य माना कि यहाँ तो कोई नहीं आ सकता, यह भूषणों का शब्द कहाँ से आया ? तब उठकर देखने लगे कि गङ्गा के प्रवाह में उर्वशी आदि महासुन्दरी अप्सराएँ वस्त्रों को उतारे हुए स्नान कर रही हैं । जब उनको नारदजी ने देखा तो उनका विवेक जाता रहा और वीर्य निकलकर उनके पास जो एक सुन्दर केल था, उसके पत्ते पर स्थित हुआ । इतना सुनकर शिखिध्वज ने कहा, हे देवपुत्र ! ऐसे ब्रह्मवेत्ता और सर्वज्ञ मननशील योगी नारद-मुनि का वीर्य किस निमित्त गिरा ? देवपुत्र ने कहा, हे राजन ! जब तक शरीर है; तब तक अज्ञानी और ज्ञानी के शरीरों का स्वभाव निवृत्त नहीं होता । परन्तु एक भेद है । ज्ञानवान् को यदि दुःख प्राप्त होता है तो वह दुःख नहीं मानता और यदि सुख प्राप्त होता है तो सुख नहीं मानता और उसमें हर्षित नहीं होता । और अज्ञानी को यदि सुख-दुःख प्राप्त होते हैं तो वह हर्ष-शोक करता है । जैसे श्वेत वस्त्र पर केसर का रङ्ग शीघ्र ही चढ़ जाता है, वैसे ही अज्ञानी को दुःख-सुख का रङ्ग शीघ्र ही चढ़ जाता है । और जैसे मोम के वस्त्रों को जल का स्पर्श नहीं होता, वैसे ही ज्ञानवान् को दुःख-सुख का स्पर्श नहीं होता । जिसके अन्तः-करणरूपी वस्त्र को ज्ञानरूपी मोम नहीं चढ़ा, उसको दुःख-सुखरूप जल स्पर्श कर जाता है । दुःख की और सुख की नाड़ी भिन्न-भिन्न है । जब सुख की नाड़ी में जीव स्थित होता है, तब कोई दुःख नहीं देखता और जब दुःख की नाड़ी में स्थित होता है, तब सुख नहीं देखता । अज्ञानी को कोई दुःख का स्थान है और कोई सुख का स्थान है और ज्ञानी को एक आभासमात्र दिखाई देता है—उसे बन्धन नहीं होता । जब तक
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अज्ञान का सम्बन्ध है, तब तक दुःख नहीं निवृत्त होता । तब राजा ने कहा कि वीर्य जो गिरता है सो कैसे निवृत्त होता है ? देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! जब चित्त वासना से क्षोभ को प्राप्त होता है; तब नाड़ियों में भी क्षोभ होता है और वे अपने स्थानों को त्यागने लगती हैं । उर्मी अवस्था में वीर्यवाली नाड़ी से भी स्वाभाविक ही वीर्य नीचे को चला आता है । फिर राजा ने पूछा, हे देवपुत्र ! स्वाभाविक किसे कहते हैं ? देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! आदि शुद्ध चैतन्य परमात्मा में जो स्फुरण हुआ है, उस क्षणमात्र शक्ति के उत्थान से प्रपञ्च बन गया है । इसमें आदि नियम यह हुआ है कि यह घट है, यह पट है, यह अग्नि है, इसमें उष्णता है, यह जल है, इसमें शीतलता है । वैसे ही यह भी नियम है कि वीर्य ऊपर से नीचे को आना है । जैसे पर्वत से पत्थर गिरता है तो नीचे को चला आता है, वैसे ही वीर्य भी नीचे को आता है । तब राजा ने प्रश्न किया कि हे देवपुत्र ! जीव को दुःख-सुख कैसे होता है और दुःख-सुख का अभाव कैसे होता है ? देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! यह जीव कुण्डलिनी शक्ति में स्थित होकर दृश्य में जो चारों अन्तःकरण, इन्द्रियाँ और देह हैं, उनमें अभिमान करके इनके दुःख से दुःखी और इनके सुख में सुखी होता है । तब जैसा-जैसा आगे प्रतिबिम्ब होता है, वैसा-वैसा दुःख-सुख भासित होता है—जैसे शुद्ध मणि में प्रतिबिम्ब पड़ता है । यह सब अज्ञान से होता है और ज्ञान में इनका अभाव हो जाता है । जब ज्ञानरूप का आवरण करके आगे पटल होता है, तब प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता । देहादिक के अभिमान से रहित होने को ज्ञान कहते हैं अर्थात् यह ज्ञान कि न देहादिक है और न मैं इनमें कुछ करता हूँ । जब ऐसे निश्चय हो, तब दुःख-सुख का भान नहीं होता; क्योंकि संसार का दुःख-सुख भावना से होता है । जब वासना से रहित हुआ, तब दुःख-सुख भी सब नष्ट हो जाते हैं । जैसे जब वृक्ष ही जल जाता है, तब पत्ते, फूल, फल कहाँ रहे ? वैसे ही अज्ञानरूप वासना के दग्ध होने पर दुःख-सुख कहाँ रहे ? फिर राजा ने कहा, हे भगवन् ! तुम्हारे वचन सुनकर मैं तृप्त नहीं होता, जैसे मेघ का शब्द सुनकर मोर तृप्त
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नहीं होता, इसमें कहिये कि आपकी उत्पत्ति कैसे हुई है ? देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! जो कोई प्रश्न करता है, उसका बड़े लोग निरादर नहीं करते। इसमें तुम जो पूछते हो सो मैं कहता हूँ। हे राजर्षि ! वह वीर्य नारदमुनि ने एक मटकी में रक्खा और उस पर दूध डाला। वह मटकी स्वर्ण की थी, जिसमें उज्ज्वल चमक थी। उस मटकी को पूर्णकर वीर्य को एक कोने की ओर किया और फिर मन्त्रों का उच्चारण किया और आहुति देकर भली प्रकार पूजन किया। जब एक मास व्यतीत हुआ तब मटकी में बालक प्रकट हुआ—जैसे चन्द्रमा क्षीरसमुद्र में निकला हो। उस बालक को लेकर नारद आकाश को उड़े। उसे अपने पिता ब्रह्माजी के पास ले आये और नमस्कार किया। वही बालक मैं हूँ। तब मुझको पितामह ने गोद में बिठा लिया और आशीर्वाद देकर कहा कि तू सर्वज्ञ होगा और शीघ्र ही अपने स्वरूप को प्राप्त होगा। कुम्भ में मैं उपजा था, इसलिए उन्होंने मेरा नाम कुम्भज रक्खा। मैं नारदजी का पुत्र और ब्रह्माजी का पौत्र हूँ। सरस्वती मेरी माता है। गायत्री मेरी मौसी है। मैं सर्वज्ञ हूँ। तब राजा ने कहा, हे देवपुत्र ! तुम सर्वज्ञ हो, यह तुम्हारे वचनों से मैं जानता हूँ। देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! जो तुमने पूछा सो मैंने कहा। अब कहो, तुम कौन हो; क्या कर्म करते हो और यहाँ किस निमित्त आये हो ? राजा ने कहा, हे देवपुत्र ! आज मेरे बड़े भाग्य उदय हुए हैं जो तुम्हारा दर्शन हुआ। तुम्हारा दर्शन बड़े भाग्य से प्राप्त होता है। यज्ञ और तप से भी तुम्हारा दर्शन श्रेष्ठ है। देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! अपना वृत्तान्त कहो। राजा ने कहा, हे देवपुत्र ! मैं राजा हूँ, शिखिध्वज मेरा नाम है। संसार दुःखदायक भासित हुआ। बारम्बार जन्म और मरण इसमें देख पड़ता है, इसमें राज्य को त्यागकर यहाँ बन में तप करने लगा हूँ। तुम त्रिकालज्ञ हो और जानते हो, तथापि तुम्हारे पूछने में कुछ कहना चाहिए। मैं त्रिकाल संध्या और जप करता हूँ तो भी मुझे शान्ति नहीं मिली। इसलिए जिसमें मेरे दुःख निवृत्त हों वह उपाय कहिये। हे देवपुत्र ! मैंने बहुत तीर्थ किये हैं और बहुत देशों और स्थानों में घूमा हूँ। पर
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ २१३
अब इसी वन में आ बैठा हूँ, तो भी मुझे शान्ति नहीं प्राप्त है। तब देव-पुत्र ने कहा, हे राजऋषि ! तुमने राज्य का तो त्याग किया, पर तपरूपी गढ़े गिर पड़े। यह तुमने क्या किया ? जैसे पृथ्वी का कीड़ा फिर पृथ्वी में ही रहता है, वैसे ही तुम एक गढ़े को त्यागकर दूसरे गढ़े में आ पड़े हो और जिस निमित्त राज्य का त्याग किया, उसको नहीं जाना। यहाँ आकर तुमने जो एक लाठी, मृगछाला और फूल रखे हैं, इनसे तो शान्ति नहीं मिलती। इससे अपने स्वरूप में जागो; जब स्वरूप में जागोगे, तब सब दुःख निवृत्त होंगे। इसी विषय पर एक समय मैंने ब्रह्माजी से प्रश्न किया था कि हे पितामह ! कर्म श्रेष्ठ है अथवा ज्ञान श्रेष्ठ है—दोनों में कौन श्रेष्ठ है ? जो मेरे लिए कर्तव्य हो सो कहिए। तब पितामह ने कहा कि ज्ञान के पाने से फिर कोई दुःख नहीं रहता और ज्ञान सब आनन्दों का आनन्द है। अज्ञानी के लिए कर्म श्रेष्ठ है; क्योंकि वे पापकर्म करेंगे तो नरक को प्राप्त होंगे। यद्यपि तप और दान करने से स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती, तो भी अज्ञानी के लिए कर्म ही श्रेष्ठ है, जिससे नरक न भोगकर वह स्वर्ग में रहे। जैसे कम्बल से रेशम का वस्त्र श्रेष्ठ है, परन्तु यदि रेशम का न पाइये तो कम्बल ही भला, वैसे ही ज्ञान रेशम की तरह है और तप कर्म कम्बल के समान है—कर्म से शान्ति नहीं होती। इससे हे राजन् ! तुम क्यों इस गढ़े में पड़े हो ? आगे तुम राज्यवासी थे और अब वनवासी हुए। यह तुमने क्या किया कि मूर्खता-वश अज्ञान में पड़े रहे। जब तक तुम्हें क्रिया का भान होता है कि मैं यह करूँ, तब तक प्रमाद है। इससे दुःख निवृत्त न होगा। निर्वासनिक होकर अपने स्वरूप के विषय में जागो निर्वासनिक होना ही मुक्ति है और वासना-सहित होना ही बन्धन है। निर्वासनिक होना ही पुरुषार्थ है। जीव जब तक वासना-सहित है, तब तक अज्ञानी है। जब निर्वासनिक हो तब ज्ञेयरूप होता है। सदा ज्ञेय की भावना करनेवाला को निर्वासनिक और ज्ञेय आत्मस्वरूप को कहते हैं। उसको जानकर फिर कोई इच्छा नहीं रहती। केवल चिन्मात्रपद स्थित होने का नाम
२१४ * योगवाशिष्ठ *
ज्ञेय है। जो जानने योग्य है, वह जान लेने पर फिर वासना नहीं रहती। केवल स्वच्छ आप ही होता है। हे राजन्! तुम्हें अपने स्वरूप को ही जानना था। फिर तुम और जंजाल में किस निमित्त पड़े हो? आत्मज्ञान बिना और अनेक यत्न करोगे तो भी शान्ति नहीं प्राप्त होगी। जैसे पवन से रहित वृक्ष शान्तरूप होता है, और जब पवन होता है तब क्षोभ को प्राप्त होकर हिलता है, वैसे ही जब वासना निवृत्त होगी तब शान्तपद प्राप्त होगा और कोई क्षोभ न रहेगा। देवपुत्र ने जब ऐसे कहा, तब राजा ने कहा, हे भगवन्! तुम मेरे पिता हो, तुम्हीं गुरु हो और तुम्हीं कृतार्थ करनेवाले हो। मैंने वासना में बड़ा दुःख पाया है। जैसे किसी वृक्ष के पत्ते, डाल, फूल, फल सूख जावें और अकेला ठूँठ रह जाय, वैसे ही ज्ञान बिना मैं भी ठूँठ सा हो रहा हूँ। इसलिए कृपा करके मुझे शान्ति का मार्ग बताओ। देवपुत्र ने कहा, हे राजन्! तुम्हें त्याग करके सन्तों का संग करना चाहिए था और यह प्रश्न करना चाहिए था कि बन्धन क्या है और मोक्ष क्या है? मैं क्या हूँ और यह संसार क्या है? संसार की उत्पत्ति किससे होती है और वह लीन कैसे होता है? तुमने यह क्या किया कि सन्तों का नहीं, ठूँठ वन का आकर सेवन किया। अब तुम सन्तजनों का संग करके निर्वासनिक बनो। ब्रह्मादिक ने भी कहा है कि जीव जब निर्वासनिक होता है, तब सुखी होता है। फिर राजा ने कहा, हे भगवन्! तुम्हीं सन्त हो और तुम्हीं मेरे गुरु और पिता हो। जिस प्रकार मुझे शान्ति हो सो कहो।
तब कुम्भज ने कहा, हे राजन्! मैं तुम्हें उपदेश करता हूँ, तुम उसे हृदय में धारण करोगे। जो तुम उसे हृदय में न धारण करोगे तो मेरे कहने से क्या होता है? जैसे डाल पर कौआ हो और शब्द भी सुने तो भी वह अपने कौए के स्वभाव को नहीं छोड़ता, वैसे ही जो तुम भी कौए की तरह हो तो मेरा कहना व्यर्थ है? जैसे तोते को जो सिखाते हैं, उसे वह सीखता है वैसे ही तुम भी हो जाओ।
शिखिध्वज ने कहा, हे भगवन्! जो तुम आज्ञा करोगे सो मैं
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करूँगा। जैसे शास्त्र और वेद के कहे कर्म करता हूँ, वैसे ही तुम्हारा कहना करूँगा। यह मेरा नियम है, जो तुम आज्ञा करोगे सो करूँगा। तब देवपुत्र ने कहा, हे राजन्! प्रथम तो तुम ऐसा निश्चय करो कि इन वचनों से मेरा कल्याण होगा। फिर ऐसे जानो कि पिता जो पुत्र को सिखाता है, सो शुभ ही होता है। मैं जो तुमसे कहूँगा, सो शुभ ही कहूँगा—उससे तुम्हारा कल्याण होगा। इसलिए निश्चय जानो कि इन वचनों से तुम्हारा कल्याण ही होगा। एक आख्यान जो पहले कभी हुआ है, कहता हूँ, उसे सुनो। एक पण्डित धन और गुणों से संपन्न था। वह सर्वदा चिन्तामणि के पाने की इच्छा करता था। इसके लिए शास्त्र में जैसे उपाय कहे हैं, वैसे ही करता था। जब कुछ काल व्यतीत हुआ, तब जैसे चन्द्रमा का प्रकाश होता है, वैसे ही प्रकाशवान चिन्तामणि उसे प्राप्त हुई। उसने उसे ऐसे निकट जाना कि हाथ से उठा लेगा। जैसे उदयाचल पर्वत के निकट चन्द्रमा उदय होता है, वैसे ही चिन्तामणि जब निकट आकर प्राप्त हुई, तब पण्डित के मन में विचार आया कि यह चिन्तामणि है अथवा कुछ और है? जो चिन्तामणि हो तो उठा लूँ और जो चिन्तामणि न हो तो किस निमित्त उठाऊँ? फिर कहा, उठा लेता हूँ, मणि ही होगी; फिर सोचा कि यह मणि नहीं है, क्योंकि मणि तो बड़े यत्न से प्राप्त होती है। मुझे सहज में क्यों प्राप्त होगी? इससे विदित होता है कि यह चिन्तामणि नहीं है। जो इस तरह आसानी से प्राप्त होती तो सब लोग धनी हो जाते।
जब ऐसे संकल्प-विकल्प कर पण्डित विचारने लगा और इससे उसके चित्त पर आवरण पड़ गया, तब मणि छिप गई; क्योंकि जो सिद्धियाँ हैं, उनका मान और आदर न करिये तो शाप देती हैं। जिस दिव्य वस्तु का कोई आवाहन करता है और उसका पूजन नहीं करता तो वह उसे त्याग जाती है। तब उसे बड़ा दुःख हुआ कि चिन्तामणि मेरे पास से चली गई। निदान वह फिर यत्न करने लगा। तब काँच की मणि उसका उपहास करने को उसके आगे आ पड़ी। उसको देखकर वह कहने लगा कि यह चिन्तामणि है। अबोध के कारण वह उसको
२१६ ✴ योगवाशिष्ठ ✴
उठाकर अपने घर ले आया और उसे ही चिन्तामणि मान लिया । जैसे मोह में जीव असत् को सत् और रज्जू को सर्प जानता है, जैसे दृष्टिदोष में दो चन्द्रमा देख पड़ते हैं और मनुष्य शत्रु को मित्र और विष को अमृतरूप जानता है, वैसे ही उसने काँच को चिन्तामणि जान कर जो कुछ अपने पास धन था, वह भी लुटा दिया और कुटुम्ब का त्यागकर कहने लगा कि मुझे चिन्तामणि प्राप्त हुई है, अब कुटुम्ब में क्या प्रयोजन है ? निदान घर से निकलकर वन में गया और वहाँ उसने बड़े दुःख पाये क्योंकि काँच की मणि में कुछ प्रयोजन नहीं सिद्ध हुआ । ऐसे ही हे राजन् ! मूर्ख लोग विद्यमान वस्तु को त्यागते हैं, उसका माहात्म्य नहीं जानते और उसको नहीं पाते ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे चिन्तामणि वृत्तान्तवर्णनं नाम नवषष्टितमस्सर्गः ॥ ६९ ॥
देवपुत्र बोले, हे राजन् ! इसी प्रकार एक और आख्यान कहता हूँ, वह भी सुनो । मन्दराचल पर्वत के वन में सब पहाड़ियों का राजा एक हाथी रहता था । वह मानो स्वयं विन्ध्याचल था, जिसको अगस्त्य मुनि ने बढ़ने से रोका था । उसके बड़े-बड़े दाँत इन्द्र के वज्र की तरह तीक्ष्ण थे और प्रलयकाल के वड़वानल के समान वह प्रकाशमान था । वह ऐसा बलवान था कि सुमेरु पर्वत को दाँतों से उठा ले । निदान उस हस्ती को एक महावत ने जैसे राजा बलि को विष्णु भगवान् ने छल करके बाँधा था, लोहे की जञ्जीर में बाँधा, और वह आम पास के एक वृक्ष पर चढ़ बैठा कि कूदकर हाथी के ऊपर चढ़ बैठूँ । वह हाथी जञ्जीर में महाकष्ट को प्राप्त हुआ । उसने इतना दुःख पाया जिसका वर्णन नहीं हो सकता । तब हाथी के मन में विचार आया कि जो अब मैं बल में जञ्जीर न तोड़ूँगा तो कैसे छूटूँगा ? यह सोचकर उसने उस जञ्जीर को बल करके तोड़ दिया । तब वृक्ष पर जो महावत बैठा था, वह गिरकर हाथी के पैरों के आगे आ पड़ा और भय को प्राप्त हुआ । जैसे वृक्ष का फल पवन से गिर पड़ता है, वैसे ही महावत भय में गिर पड़ा । जब इस प्रकार महावत गिरा, तब हाथी ने विचार किया
✻ निर्वाण प्रकरण ✻ २१७
कि यह मृतक समान है, इस मरे को क्या मारना है? यद्यपि यह मेरा शत्रु है तो भी मैं इसे नहीं मारूँगा, इसके मारने से मेरा क्या पुरुषार्थ सिद्ध होगा? इसलिये जैसे स्वर्ग के द्वार को तोड़कर दैत्य वहाँ प्रवेश करते हैं, वैसे ही जञ्जीर तोड़कर वह हाथी वन में गया और महावत हाथी को, गया देख उठ बैठा और अपने स्वभाव में स्थित हुआ।
वह फिर हाथी के पीछे चला और हाथी को ढूँढ़ लिया। जैसे चन्द्रमा को राहु खोज लेता है, वैसे ही वन में हाथी को उसने खोज लिया। तब क्या देखता है कि वह वृक्ष के नीचे सोया पड़ा है। जैसे संग्राम को जीतकर सूरमा निश्चिन्त सोता है, वैसे ही हाथी को निश्चिन्त सोया पड़ा देख महावत ने विचार किया कि इसको वश में करना चाहिए। यह विचार उसने यह उपाय किया कि वन के चारों ओर खाई बनाई और खाई के ऊपर कुछ तृण और घाम डाली। जैसे शरत्काल के आकाश में बादल देखने भर को होता है, वैसे ही तृण और घाम खाई के ऊपर देखने भर को देख पड़ती थी। निदान जब किसी समय हाथी उठकर चला और खाई के बीच गिर पड़ा, तब महावत ने हाथी के निकट आ उसे जञ्जीरों में बाँधा। तब वह हाथी बड़े दुःख को प्राप्त हुआ। जो तप करके वन में दुःख पाता है, उसने भविष्य का विचार नहीं किया। अज्ञानी को भविष्य का विचार नहीं होता, इसी से वह दुःख पाता है। हे राजन्! यह जो मणि और हाथी के आख्यान तुमको मैंने सुनाये हैं, उनको जब तुम समझ लोगे तब आगे मैं उपदेश करूँगा।
इति श्रीयो० नि० हस्तिआख्यानवर्णनं नाम सप्ततितमसर्गः॥ ७० ॥
इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे राम! जब देवपुत्र ने ऐसे कहा, तब राजा बोला, हे देवपुत्र! यह दो आख्यान जो तुमने कहे हैं, सो तुम्हीं जानते हो, मैं तो कुछ नहीं समझा। इससे तुम्हीं इन्हें समझाकर कहो। देवपुत्र ने कहा, हे राजन्! तुम शास्त्र के अर्थ में तो बहुत चतुर हो और सब अर्थों के ज्ञाता हो, परन्तु स्वरूप में तुम्हारी स्थिति नहीं है। इससे जो वचन में कहता हूँ, उसे बुद्धि से ग्रहण करो। हस्ती क्या है और
२१ = ❊ योगवाशिष्ठ ❊
चिन्तामणि क्या है ? प्रथम जो तुमने सब त्याग किया था सो चिन्ता- मणि थी और उसके निकट प्राप्त होकर तुम सुखी हुए थे । यदि उसको तुम अपने पास रखते तो सब दुःख निवृत्त हो जाते । पर मणि का तो तुमने निरादर किया, जो उसको त्यागा और काँच की मणि तप- क्रिया को ग्रहण किया, इसलिए दरिद्री ही रहे । हे राजन् ! सर्वत्याग- रूपी चिन्तामणि थी और इस क्रिया का आरम्भ काँच की मणि है । उसको तुमने ग्रहण किया है । इससे दरिद्री की निवृत्ति नहीं होती— मनुष्य दुःखी ही रहता है । हे राजन् ! सर्वत्याग तुमने नहीं किया, और जो किया भी था, पर कुछ शेष रह गया और वह रहकर फिर फैल गया । जैसे बड़ा बादल वायु से क्षीण हो जाता है और सूक्ष्म रह जाता है, और पवन के लगने से फिर फैल जाता है और सूर्य को छिपा लेता है । वह बादल क्या है, सूर्य क्या है और थोड़ा रहना क्या है, यह भी सुनो । स्त्रियों और कुटुम्ब आदि को त्याग कर इसमें अहंकार करना ही बड़ा बादल है । वैराग्यरूपी पवन से तुमने राज्य और कुटुम्ब का अहंकार त्याग किया; पर देहादिक में अहंकार सूक्ष्म बादल मा-रह गया था सो वह फिर बढ़ गया । तुमने जो अनात्म में अभिमान करके क्रिया का आरम्भ किया, इससे आत्मारूपी सूर्य जो अपना आप है, वह अहंकाररूपी बादल से ढक गया और ज्ञानरूपी चिन्तामणि अज्ञानरूपी काँच की मणि से छिप गई ? जब ज्ञान से आत्मा को जानोगे, तब आत्मा प्रकाशित होगा, अन्यथा न भासित होगा । जैसे कोई पुरुष घोड़े पर चढ़कर दौड़ता है तो उसकी वृत्ति घोड़े में होती है, वैसे ही जिस पुरुष का आत्मा में दृढ़ निश्चय होता है, उसको आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासित होता । हे राजन् ! आत्मा को पाना सुगम है, जो सुख से ही मिलता है और उससे बड़े आनन्द की प्राप्ति होती है । तप आदिक क्रियाएँ कष्ट से सिद्ध होती हैं, उनसे स्वरूप- सुख की प्राप्ति नहीं होती ।
हे राजन् ! मैं जानता हूँ कि तुम मूर्ख नहीं, बल्कि शास्त्रों के ज्ञाता और बहुत चतुर हो । तथापि तुम्हें स्वरूप में स्थिति नहीं प्राप्त हुई
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ <span style="float:right;">२१५</span>
जैसे आकाश में पत्थर नहीं ठहरता। इससे में जो उपदेश करता हूँ, उसको ग्रहण करो तो तुम्हारे दुःख निवृत्त हो जावेंगे। हे राजन्! यह सबसे श्रेष्ठ ज्ञान कहा है। अब और कहता हूँ। तुमने जो तप का आरम्भ किया है और उसका जो फल जाना है, उस ज्ञान से यह श्रेष्ठ ज्ञान कहता हूँ। इससे तुम्हारा भ्रम निवृत्त हो जायगा। हे राजन्! मैंने यह चिन्तामणि का सम्पूर्ण तात्पर्य तुमसे कहा। अब हाथी का वृत्तान्त, जो आश्चर्यरूप है, वह भी सुनो, जिसके समझने से अज्ञान निवृत्त हो जायगा। मन्दराचल का हाथी तो तुम हो और महावत तुम्हारा अज्ञान है। इस अज्ञानरूपी महावत ने तुमको बाँधा था और तुम आशारूपी जञ्जीरों से बँधे। और जञ्जीरें घिस जाती हैं, पर आशारूपी फाँसी नहीं कटती। यह दिन दिन बढ़ती ही जाती है। हे राजन्! आशारूपी फाँसी से तुम महादुःखी थे। हस्ती के जो बड़े दाँत थे, जिनसे उसने साँकलों को तोड़ा था, वे विवेक और वैराग्य थे। तुमने विचार किया कि में बल करके छूटूँ। राज्य, कुटुम्ब और पृथ्वी का त्याग कर जब तुमने उस फाँसी को काटा तब आशारूपी रस्से कटे तो अज्ञानरूपी महावत भय को प्राप्त हुआ और तुम्हारे चरणों के तले आ पड़ा। जैसे वृक्ष के ऊपर वैताल रहता है और कोई वृक्ष को काटने आता है तब वैताल भय को प्राप्त होता है, वैसे ही तुमने वैराग्य और विवेकरूपी दाँतों से आशा के फाँस काटे, तब अज्ञानरूपी महावत गिरा और तुमने एक घाव लगाया, परन्तु मार न डाला, इससे महावत वैसे ही तुमसे भाग गया, जैसे वृक्ष पर वैताल रहता है और वृक्ष को कोई काटने लगता है, तब वैताल भाग जाता है। हे राजन्! वैसे ही वृक्ष को तुमने वैराग्यरूपी शस्त्र से काटा, तब अज्ञानरूपी वैताल भागा था; मूर्खता से उसको तुमने नहीं मारा, बल्कि उसको छोड़कर वन को गये। जब तुम वन में आये, तब अज्ञानरूपी महावत तुम्हारे पीछे चला आया और उसने तुम्हारे चारों ओर खाई खोदी। तब आदिक क्रिया आरम्भ कर तुम उस खाई में गिर पड़े और महादुःख को प्राप्त हुए। तब उसने तुम्हें जञ्जीरों से फिर बाँधा और बँधे हुए तुम अब तक दुःख पाते हो।
२२० :: योगवासिष्ठ ::
अनात्म अभिमान में तुमने यहाँ तपादिक क्रियाओं का आरम्भ किया है। ऐसी खाई में तुम पड़े हो।
हे राजन् ! तुम जानकर खाई में नहीं पड़े। खाई के ऊपर घास और तृण पड़ा था, उस छल से तुम गिर पड़े हो। वह छल और तृण क्या है, यह भी तुम सुनो। प्रथम तो अज्ञानरूपी शत्रु को तुमने न मारा और जञ्जीर के भय से भागे कि वन मेरा कल्याण करेगा; पर सन्तों और शास्त्रों के वचनों को न जाना कि वे तुम्हारे दुःख निवृत्त करेंगे। उन वचनरूपी खाई पर तृणादिक था, इसी मूर्खता के कारण तुम गिरे। जैसे राजा बलि पाताल में छल से बाँधा हुआ है, वैसे ही तुमने भविष्य का विचार न किया कि अज्ञानरूपी शत्रु जो रह गया है, वह मेरा नाश करेगा। इस विचार के बिना तुम फिर दुःखी हुए। सब त्याग तो किया, परन्तु यह न जाना कि मैं अक्रिय हूँ, इस क्रिया का आरम्भ काहे को करता हूँ? इसी से तुम फिर फाँसी में बँधे हो। हे राजन् ! जो पुरुष इस फाँसी से मुक्त हुआ है, वही मुक्त है और जिसका चित्त अनात्म-अभिमान से बँधा है कि यह मुझे प्राप्त हो, वह उससे दुःख पाता है। जिस पुरुष ने वैराग्य और विवेकरूपा दाँतों से आशारूपी जञ्जीर को नहीं काटा, वह कदापि सुख नहीं पाता। विवेक से वैराग्य उत्पन्न होता है और वैराग्य से विवेक होता है। विवेक सत्य के जानने और असत् देहादिक को असत्य जानने को कहते हैं। जब ऐसे जाना तब असत् की ओर भावना नहीं जाती, यह वैराग्य हुआ। वैराग्य से विवेक और विवेक से वैराग्य उपजता है। इन विवेक और वैराग्यरूपी दाँतों से आशारूपी जञ्जीर को तोड़ो। हे राजन् ! यह हस्ती का वृतान्त जो तुमसे कहा है, उस पर विचार करने से तुम्हारा मोह निवृत्त हो जावेगा। हे राजन् ! वह हाथी बड़ा बली था और महावत कम बली। उस अज्ञानरूपी महावत को मूर्खता करके तुमने न मारा, इसी से दुःख पाते हो। अब तुम वैराग्य और विवेकरूपी दाँतों से आशारूपी फाँसी को तोड़ो, तब दुःख सब मिट जावेंगे।
इति श्रीयो० नि० हस्तीवृत्तान्तवर्णनं नामैकसप्ततितमस्सर्गः ॥ ७१ ॥
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २२१
देवपुत्र बोले, हे राजन् ! ब्रह्मवेत्ता और सब ज्ञानियों में श्रेष्ठ, साक्षात् ब्रह्मस्वरूप और सत्यवादिनी तुम्हारी स्त्री जो चूडाला थी, उसने तुम्हें उपदेश किया था; पर तुमने उसके वचनों का किस निमित्त निगदर किया ? में तो सब जानता हूँ, क्योंकि त्रिकालज्ञ हूँ; तो भी तुम अपने मुख से कहो । एक तो यह मूर्खता की कि उपदेश न अङ्गीकार किया और दूसरी यह मूर्खता की कि सर्वत्याग न करके फिर वन अङ्गीकार किया । जो सर्वत्याग करते तो सब दुःख मिट जाते । जब ऐसे देवपुत्र ने कहा, तब राजा ने कहा, हे देवपुत्र ! मैंने तो स्त्री, पृथ्वी, मन्दिर, हाथी इत्यादिक ऐश्वर्य और कुटुम्ब को त्याग किया है; आप कैसे कहते हैं कि त्याग नहीं किया ? देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! तुमने क्या त्यागा है ? राज्य में तुम्हारा क्या था । जैसे ऐश्वर्य आगे था, वैसे ही अब भी है और स्त्रियाँ भी जैसे और मनुष्य थे वैसे ही थीं; पृथ्वी, मन्दिर और हस्ती जैसे आगे थे, वैसे ही अब भी हैं । उनमें तुम्हारा क्या था जो त्याग किया ? हे राजन् ! सर्वत्याग तुमने अब भी नहीं किया । जो तुम्हारा हो उसको तुम त्याग करो, जिससे निर्दुःख पद को प्राप्त होओ । इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार देवपुत्र ने कहा, तब शूरवीर जो इन्द्रियजित् राजा था, वह मन में विचारने लगा कि यह वन मेरा है और वृक्ष, फूल, फल मेरे हैं, इनका त्याग करूँ । ऐसा विचारकर बोला, हे देवपुत्र ! वन, वृक्ष, फूल और फल जो मेरे थे, उनका भी मैंने त्याग किया । अब तो सर्वत्याग हुआ ? तब देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! अब भी सर्वत्याग नहीं हुआ; क्योंकि वन, वृक्ष, फूल और फल तुमसे पहले भी थे । इनमें तुम्हारा क्या है ? जो तुम्हारा हो, उसको त्यागो, तब सुखी होगे ।
हे राम ! जब इस प्रकार देवपुत्र ने कहा, तब राजा ने मन में विचार किया कि मेरी जलपान की बावली और बगीचे हैं, इनका त्याग करूँ, तब सर्वत्याग सिद्ध हो । फिर कहा, हे भगवन् ! मेरी यह बावली और बगीचे हैं, उनका भी मैंने त्याग किया । अब तो मेरा सर्वत्याग सिद्ध हुआ ? तब देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! सर्वत्याग अब
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<p align="center">❇ योगवाशिष्ठ ❇</p>भी नहीं हुआ। जो तुम्हारा है, उसको जब त्यागोगे, तब शान्तपद को प्राप्त होगे। हे राम! जब इस प्रकार देवपुत्र ने कहा, तब राजा विचारने लगा कि अब मेरी मृगछाला और कुटी है, उसका भी त्याग करूँ। ऐसे विचारकर बोला कि हे देवपुत्र! मेरे पास एक मृगछाला और एक कुटी है। उसका भी मैंने त्याग किया। अब तो सर्वत्यागी हुआ? तब देवपुत्र ने कहा, हे राजन्! मृगछाला में तुम्हारा क्या है, यह तो मृग की त्वचा है। और कुटी में तुम्हारा क्या है, यह तो मिट्टी और शिला की बनी है। इससे तो सर्वत्याग सिद्ध नहीं होता? जो कुछ तुम्हारा है, उसको त्यागोगे, तब सर्वत्याग होगा और तभी तुम सब दुःखों से छूट जाओगे। हे राम! जब ऐसे कुम्भज ने कहा, तब राजा ने मन में विचार किया कि अब मेरा एक कमण्डलु, एक माला और एक लाठी है, इसका भी त्याग करूँ। ऐसे विचारकर राजा शान्ति के लिए बोला, हे देवपुत्र! मेरी लाठी, कमण्डलु और एक माला है, उसका भी मैंने त्याग किया। अब तो में सर्वत्यागी हुआ?
देवपुत्र ने कहा, हे राजन्! कमण्डलु में तुम्हारा क्या है? कमण्डलु तो वन का तुम्बा है, उसमें तुम्हारा कुछ नहीं। लाठी भी वन के बाँस की है और माला भी काष्ठ की है, उनमें तुम्हारा क्या है? जो कुछ तुम्हारा है उसका त्याग करो। जब तुम उसका त्याग करोगे, तब दुःख से रहित हो जाओगे। हे राम! जब इस प्रकार कुम्भज ने कहा, तब राजा शिखरध्वज ने मन में विचारा कि अब मेरा क्या रह गया। तब देखा कि एक आसन और वासन हैं, जिसमें फूल और फल रखते हैं; अब इनका भी त्याग करूँ। तब राजा ने कहा, हे भगवन्! आसन और वासन मेरे पास रह गये हैं, इनका भी में त्याग करता हूँ। अब तो सर्वत्यागी हुआ? तब कुम्भज ने कहा, हे राजन्! अब भी सर्वत्याग नहीं हुआ। आसन तो भेड़े की ऊन का है और वासन मृत्तिका के हैं; इनमें तुम्हारा कुछ नहीं। जो कुछ तुम्हारा है, उसका त्याग करो, तब सर्वत्याग हो और तुम दुःख से निवृत्त होगे। हे राम! जब इस प्रकार कुम्भज ने कहा, तब राजा उठ खड़ा हुआ और वन की लकड़ी इकट्ठी करके उनमें
☀️ निर्वाण प्रकरण ☀️ २२३
आग लगाई । जब बड़ी अग्नि लगी तब लाठी को हाथ में लेकर कहने लगा, हे लाठी ! मैं तेरे साथ बहुत देशों में फिरा हूँ, परन्तु तूने मेरे साथ कुछ उपकार न किया । अब मैं कुम्भज मुनि की कृपा से तरूँगा, तुझे नमस्कार है । ऐसे कहकर लाठी को अग्नि में डाल दिया । फिर मृगछाला को हाथ में लेकर कहा, हे मृग की त्वचा ! बहुत दिन मैं तेरे ऊपर बैठा हूँ, परन्तु तूने कुछ उपकार न किया । अब कुम्भज मुनि की कृपा से मैं तरूँगा, तुझे नमस्कार है । ऐसे कहकर मृगछाला को अग्नि में डाल दिया ।
फिर कमण्डलु को लेकर कहने लगा, हे कमण्डलु ! तू धन्य है कि मैंने तुझे धारण किया और तूने मेरे जल को धरा । तूने मुझमे गुणगोपन नहीं किया, तो भी कमण्डलु की जैसी प्रवृत्ति त्यागनी है, वैसी ही निवृत्ति की कल्पना भी त्यागनी है । इससे तुझे नमस्कार है, तू जा । ऐसे कहकर कमण्डलु भी अग्नि में जला दिया । फिर माला को हाथ में लेकर कहने लगा, हे माले ! तेरे दाने जो मैंने घुमाये हैं सो मानों अपने जन्म गिने हैं । तेरे सम्बन्ध से जप किया है और दिशा-विदिशा गया हूँ । अब तुझको नमस्कार है । ऐसे कहकर माला को भी अग्नि में डाल दिया । इसी प्रकार फल, फूल कुटी और आसन सब जला दिये । तब बड़ी अग्नि जगी और बड़ा प्रकाश हुआ । जैसे सुमेरु पर्वत के ऊपर सूर्य चढ़े और मणि का भी चमत्कार हो तो बड़ा प्रकाश होता है, वैसे ही बड़ी अग्नि लगी और राजा ने सम्पूर्ण सामग्री का त्याग किया । जैसे पके फल को वृक्ष त्यागता है और जैसे पवन चलने से ठहरता है तब धूल से रहित होता है, वैसे ही राजा सम्पूर्ण सामग्री को त्याग निर्विघ्न निर्द्वन्द्व हुआ ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शिखिध्वजसर्वत्याग-वर्णनं नाम द्विसप्ततितमस्सर्गः ॥ ७२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! निदान सम्पूर्ण सामग्री जलकर भस्म हो गई । जैसे सदाशिव के गणों ने दक्ष प्रजापति के यज्ञ को स्वाहा कर दिया था, वैसे ही जितनी कुछ सामग्री थी, सो सब स्वाहा हो गई