योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1031, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें२२२
<p align="center">❇ योगवाशिष्ठ ❇</p>भी नहीं हुआ। जो तुम्हारा है, उसको जब त्यागोगे, तब शान्तपद को प्राप्त होगे। हे राम! जब इस प्रकार देवपुत्र ने कहा, तब राजा विचारने लगा कि अब मेरी मृगछाला और कुटी है, उसका भी त्याग करूँ। ऐसे विचारकर बोला कि हे देवपुत्र! मेरे पास एक मृगछाला और एक कुटी है। उसका भी मैंने त्याग किया। अब तो सर्वत्यागी हुआ? तब देवपुत्र ने कहा, हे राजन्! मृगछाला में तुम्हारा क्या है, यह तो मृग की त्वचा है। और कुटी में तुम्हारा क्या है, यह तो मिट्टी और शिला की बनी है। इससे तो सर्वत्याग सिद्ध नहीं होता? जो कुछ तुम्हारा है, उसको त्यागोगे, तब सर्वत्याग होगा और तभी तुम सब दुःखों से छूट जाओगे। हे राम! जब ऐसे कुम्भज ने कहा, तब राजा ने मन में विचार किया कि अब मेरा एक कमण्डलु, एक माला और एक लाठी है, इसका भी त्याग करूँ। ऐसे विचारकर राजा शान्ति के लिए बोला, हे देवपुत्र! मेरी लाठी, कमण्डलु और एक माला है, उसका भी मैंने त्याग किया। अब तो में सर्वत्यागी हुआ?
देवपुत्र ने कहा, हे राजन्! कमण्डलु में तुम्हारा क्या है? कमण्डलु तो वन का तुम्बा है, उसमें तुम्हारा कुछ नहीं। लाठी भी वन के बाँस की है और माला भी काष्ठ की है, उनमें तुम्हारा क्या है? जो कुछ तुम्हारा है उसका त्याग करो। जब तुम उसका त्याग करोगे, तब दुःख से रहित हो जाओगे। हे राम! जब इस प्रकार कुम्भज ने कहा, तब राजा शिखरध्वज ने मन में विचारा कि अब मेरा क्या रह गया। तब देखा कि एक आसन और वासन हैं, जिसमें फूल और फल रखते हैं; अब इनका भी त्याग करूँ। तब राजा ने कहा, हे भगवन्! आसन और वासन मेरे पास रह गये हैं, इनका भी में त्याग करता हूँ। अब तो सर्वत्यागी हुआ? तब कुम्भज ने कहा, हे राजन्! अब भी सर्वत्याग नहीं हुआ। आसन तो भेड़े की ऊन का है और वासन मृत्तिका के हैं; इनमें तुम्हारा कुछ नहीं। जो कुछ तुम्हारा है, उसका त्याग करो, तब सर्वत्याग हो और तुम दुःख से निवृत्त होगे। हे राम! जब इस प्रकार कुम्भज ने कहा, तब राजा उठ खड़ा हुआ और वन की लकड़ी इकट्ठी करके उनमें