योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें☀️ निर्वाण प्रकरण ☀️ २२३
आग लगाई । जब बड़ी अग्नि लगी तब लाठी को हाथ में लेकर कहने लगा, हे लाठी ! मैं तेरे साथ बहुत देशों में फिरा हूँ, परन्तु तूने मेरे साथ कुछ उपकार न किया । अब मैं कुम्भज मुनि की कृपा से तरूँगा, तुझे नमस्कार है । ऐसे कहकर लाठी को अग्नि में डाल दिया । फिर मृगछाला को हाथ में लेकर कहा, हे मृग की त्वचा ! बहुत दिन मैं तेरे ऊपर बैठा हूँ, परन्तु तूने कुछ उपकार न किया । अब कुम्भज मुनि की कृपा से मैं तरूँगा, तुझे नमस्कार है । ऐसे कहकर मृगछाला को अग्नि में डाल दिया ।
फिर कमण्डलु को लेकर कहने लगा, हे कमण्डलु ! तू धन्य है कि मैंने तुझे धारण किया और तूने मेरे जल को धरा । तूने मुझमे गुणगोपन नहीं किया, तो भी कमण्डलु की जैसी प्रवृत्ति त्यागनी है, वैसी ही निवृत्ति की कल्पना भी त्यागनी है । इससे तुझे नमस्कार है, तू जा । ऐसे कहकर कमण्डलु भी अग्नि में जला दिया । फिर माला को हाथ में लेकर कहने लगा, हे माले ! तेरे दाने जो मैंने घुमाये हैं सो मानों अपने जन्म गिने हैं । तेरे सम्बन्ध से जप किया है और दिशा-विदिशा गया हूँ । अब तुझको नमस्कार है । ऐसे कहकर माला को भी अग्नि में डाल दिया । इसी प्रकार फल, फूल कुटी और आसन सब जला दिये । तब बड़ी अग्नि जगी और बड़ा प्रकाश हुआ । जैसे सुमेरु पर्वत के ऊपर सूर्य चढ़े और मणि का भी चमत्कार हो तो बड़ा प्रकाश होता है, वैसे ही बड़ी अग्नि लगी और राजा ने सम्पूर्ण सामग्री का त्याग किया । जैसे पके फल को वृक्ष त्यागता है और जैसे पवन चलने से ठहरता है तब धूल से रहित होता है, वैसे ही राजा सम्पूर्ण सामग्री को त्याग निर्विघ्न निर्द्वन्द्व हुआ ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शिखिध्वजसर्वत्याग-वर्णनं नाम द्विसप्ततितमस्सर्गः ॥ ७२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! निदान सम्पूर्ण सामग्री जलकर भस्म हो गई । जैसे सदाशिव के गणों ने दक्ष प्रजापति के यज्ञ को स्वाहा कर दिया था, वैसे ही जितनी कुछ सामग्री थी, सो सब स्वाहा हो गई