योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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और वह बन बड़ा प्रज्वलित हुआ । जितने वृक्ष के रहनेवाले पक्षी थे, वे भाग गये और मृग, पशु जो आहार व जुगाली करते थे, वे भी सब भाग गये । जैसे पुर में आग लगने से पुरवासी भाग जावें, वैसे ही सब भाग गये । तब राजा ने मन में विचार कि अब कुम्भज की कृपा से में बड़े आनन्द को प्राप्त हुआ और अब सब मेरे दुःख मिट गये । जो कुछ वस्तु मन के संकल्प से रची थी सो सब जला दी, अब उनका न मुझ हर्ष है, न शोक । ये सब दुःख ममत्व से होते हैं, सो मेरा ममत्व अब किसी में नहीं रहा, इससे कोई दुःख भी नहीं । अब में ज्ञानवान हुआ हूँ, अब मेरी जय है; क्योंकि अब निर्मल होकर सबका मैंने त्याग किया है । ऐसा विचार करके राजा उठ खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर बोला, हे देवपुत्र ! अब तो मैंने सबका त्याग किया; क्योंकि आकाश मेरा वस्त्र है और पृथ्वी मेरी शय्या है ।
जब राजा ने ऐसे कहा, तब कुम्भज मुनि ने कहा, हे राजन् ! अब भी सर्वत्याग नहीं हुआ । जो तुम्हारा है उसका त्याग करो, जिससे तुम्हारे सब दुःख निवृत्त हो जावें । फिर राजा ने कहा, हे भगवन् ! अब तो मेरे पास और कुछ नहीं रहा, नङ्गा होकर तुम्हारे आगे खड़ा हूँ । अब एक रक्त-मांस की देह इन्द्रियों को धारण करनेवाली है । जो कहो तो इसका भी त्याग करूँ । पर्वत पर जाकर डाल दूँ । ऐसे कहकर राजा पर्वत को दौड़ा, पर कुम्भज मुनि ने रोका और कहा, हे राजन् ! ऐसे पुण्यवान् देह को क्यों त्यागते हो ? इसके त्याग से सर्वत्याग नहीं होता । जिसके त्याग से सर्वत्याग हो, उसका त्याग करो । इस देह में क्या दूषण है । जैसे वृक्ष में फूल-फल होते हैं और जब वायु चलती है, तब गिरते हैं, सो फूल-फल गिरने का कारण वायु है, वृक्ष में कुछ दूषण नहीं, वैसे ही देह में कुछ दूषण नहीं । देह को पालनेवाला जो अभिमान है, उसका त्याग करो तो सर्वत्याग सिद्ध हो । देह तो जड़ है, जो कुछ मनुष्य इसको देता है, वही यह लेता है, आगे से बोलता नहीं । इस जड़ के त्यागे क्या सिद्ध होता है ? जैसे पवन से वृक्ष हिलता है और भूकम्प में पर्वत काँपते हैं, वैसे ही देह आप कुछ नहीं करती;