योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २२५
और की प्रेरणा से चेष्टा करती है । जैसे पवन से समुद्र के तरङ्ग तृणों को जहाँ ले जाते हैं, वहाँ वे चले जाते हैं, वैसे ही देह आपसे कुछ नहीं करती । इसको जो प्रेरणा करनेवाला है, उसके बल से यह चेष्टा करती है । इससे देह के प्रेरक का त्याग करो तो सुखी होगे । हे राजन् ! जिससे सब है, जिसमें सब शब्द है और जो सब ओर से त्यागने योग्य है, उसका त्याग करो ।
राजा ने पूछा, हे भगवन् ! वह कौन है जो सब है, जिसमें सब शब्द है और जो सब ओर से त्यागने योग्य है ? हे तत्त्ववेत्ताओं में श्रेष्ठ ! जिसके त्याग से जग व मृत्यु नष्ट हो जावे, सो कहिये । तब कुम्भज ने कहा, हे राजन् ! जिसका नाम चित्त (आकार) है उसका त्याग करो । बाहर नाना प्रकार के आकार चित्त ही मे देख पड़ते हैं, इससे चित्त का ही त्याग करो । हे राजन् ! सर्प बिल में बैठा हो तो बिल का कुछ दूषण नहीं, विष-सर्प में है, जिसमें वह डसता है । इस-लिए उसके नाश का उपाय करो । और सब शब्द भी इस चित्त में ही हैं । आत्मा तो चिन्मात्र है । उसमें न एक है और न द्वैत है । सब ओर से इसी चित्त का त्याग करना योग्य है । जब इस चित्त का त्याग करोगे, तब त्यागरूपी अमृत से अमर हो जाओगे और जग-मृत्यु से रहित होगे । जो चित्त का त्याग न करोगे तो फिर देह धारण कर दुःख भोगोगे । जैसे एक खेत में अनेक दाने उत्पन्न होते हैं, पर जब खेत ही जल जाता है, तब अन्न नहीं उपजता, वैसे ही यह जो देह और जरा-मृत्यु नामक संसार के दुःख हैं, इनका बीज चित्त ही है । जैसे अनेक दानों का कारण खेत है, वैसे ही संसार के असंख्य दुःखों का कारण चित्त है । इससे हे राजन् ! चित्त का त्याग करो । जब इसका त्याग करोगे तब सुखी होगे । हे राजन् ! जिसने सर्वत्याग किया, वह सुखी हुआ है । जैसे आकाश सब पदार्थों से रहित है, किसी का स्पर्श नहीं करता और सबसे बड़ा और सुखरूप है और सब पदार्थों के नष्ट होने पर भी ज्यों का त्यों रहता है, वैसे ही हे राजन् ! तुम भी सर्व-त्यागी हो रहो । राज्य, देह, कुटुम्ब और गृहस्थ आदिक जो आश्रम