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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1035, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1035

२२६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

है, उन सबकी चित्त ने कल्पना की है। जो एक का त्याग नहीं होता तो कुछ नहीं त्यागा। जब चित्त का त्याग करोगे, तब सर्व-त्याग हो।

हे राजन! यह धर्म, वैराग्य और ऐश्वर्य तीनों चित्त की कल्पना हैं, जब चित्त पुण्यकर्म में लगता है, तब पुण्य ही प्राप्त होता है और जब पापक्रिया में लगता है, तब पाप ही प्राप्त होकर अधर्म और दरिद्र होता है। जब पुण्य का फल उदय होता है, तब सुख प्राप्त होता है और जब पाप का उदय होता है, तब दुःख प्राप्त होता है। इससे जन्ममरण के दुःख नहीं मिटते। जब चित्त का त्याग होता है, तब सब दुःख नष्ट हो जाते हैं। हे राजन! जो पुरुष किसी वस्तु को नहीं चाहता, उसकी बहुत पूजा होती है। जो कहता है कि इस वस्तु को मुझको दे, उसको कोई नहीं देता। इससे सर्वत्याग कर सुखी हो। सर्वत्याग करने में सर्वव्यापी तुम ही होगे और सर्वात्मा होकर संपूर्ण ब्रह्माण्ड अपने में देखोगे। जैसे माला के दाने में तागा होता है, और दाने भी तागे के आधार में होते हैं, उनमें और कुछ नहीं होता, वैसे ही देखोगे कि तुम सर्वमय और एकरस हो; तुम ही में ब्रह्माण्ड स्थित है। सब तुमही हो, तुमसे कुछ भिन्न नहीं। हे राजन! जिसने सबका त्याग किया है, वह सुखी है और समुद्र की नाईं स्थित है, उसको कोई दुःख नहीं। इससे तुम चित्त का त्याग करो, जिसमें रागद्वेष मिट जावे। इस चित्त के इतने नाम हैं—चित्त, मन, अहंकार, जीव और माया। हे राजन! अपने ऐश्वर्य को त्यागने और औरों की भिक्षा लेने में तो चित्त वश नहीं होता, चित्त तभी वश होता है, जब पुरुष निर्वास्निक होता है। जब तक चित्त रहता है, तब तक सर्वत्याग नहीं होता। जब चित्त की चेतना निवृत्त होती है, तब चित्त का त्याग होता है। चित्त का त्याग करने पर भी जब त्याग के अभिमान से रहित होगे, तब सर्वात्मा होगे। जब चित्त को त्यागोगे, तब उस पद को प्राप्त होगे, जो जितने ऐश्वर्य और सुख है उनका आधार है; जितने दुःख हैं उनका नाश करनेवाला है; जिसके जान लेने पर किसी पदार्थ की इच्छा न

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