योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २२७
रहेगी; क्योंकि सब आनन्दों का आधार तेरा स्वरूप है, फिर इच्छा किसकी रहे। जैसे आकाश के आश्रय में देवलोक आदि सब विश्व रहता है और आकाश को कुछ इच्छा नहीं वैसे ही वह ब्रह्मपद है। आकाश कोई इच्छा नहीं करता, तो भी सब कुछ आकाश ही में है और वह सबका आधार है, वैसा ही ब्रह्म है। वही ब्रह्मरूप तुम हो।
हे राजन्! जब तुम भी किसी की इच्छा न करोगे, तब निर्वासनिक होकर अपने स्वरूप में स्थित होगे और जानोगे कि सबका आत्मा मैं ही हूँ, सबको धारण कर रहा हूँ और भूत भविष्यत्, वर्तमान तीनों काल भी मेरे आश्रय में हैं। जैसे समुद्र के आश्रित तरङ्ग हैं, वैसे ही मेरे आश्रित काल है। चित्त का सम्बन्ध तुम्हें प्रमाद से है और प्रमाद यही है कि चिन्मात्रपद में चित्त होकर फुरता है। चित्त ऐसा है कि वह जड़ भी है और चेतन भी। इसी का नाम चिज्जड़ग्रन्थि है। जब यह ग्रन्थि खुल जावेगी, तब तुम अपने को वासुदेव रूप जानोगे। जब निर्वासनिक होगे, तब संसाररूपी वृक्ष नष्ट हो जावेगा। जैसे बीज में वृक्ष होता है, वैसे ही चित्त में संसार है और जैसे बीज के जलने से वृक्ष भी जल जाता है, वैसे ही वासना के दग्ध होने से संसार भी दग्ध होता है। हे राजन्! जैसे किसी डिब्बे में रत्न होते हैं तो रत्नों के नाश होने पर डिब्बा नहीं नष्ट होता, पर डिब्बे के नष्ट होने पर रत्न नष्ट होते हैं। डिब्बा क्या है और रत्न क्या है सो भी सुनो। डिब्बा तो चित्त है और रत्न देह है। इससे चित्त के नष्ट होने का उपाय करो। जब चित्त नष्ट होगा, तब देह से रहित होगे। देह के नष्ट होने पर चित्त नहीं नष्ट होता; पर चित्त के नष्ट होने पर देह नष्ट हो जाती है। जब यह देह चित्तरूपी धूल से रहित होगा, तब तुम केवल शुद्ध आकाश रहोगे।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे चित्तत्यागवर्णनं नाम त्रिसप्ततितमसर्गः ॥ ७३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! जब इस प्रकार कुम्भज ने कहा कि चित्त का त्यागना ही सर्वत्याग है, तब शिखिध्वज ने पूछा, हे भगवन्! मैं चित्त को कैसे स्थित करूँ? चित्त संसाररूपी आकाश की धूल है।