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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1037, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1037

२२८ * योगवाशिष्ठ *

संसाररूपी वृक्ष का निवासी चित्तरूपी वानर कभी स्थिर नहीं होता; ऐसे चित्त को मैं कैसे स्थिर करूँ? तब कुम्भज ने कहा, हे राजन! चित्त का रोकना तो सुगम है। नेत्रों के खोलने और मूँदने में भी कुछ यत्न करना पड़ता है, परन्तु चित्त के रोकने में कुछ यत्न नहीं। हाँ, दीर्घदर्शी को यह सुगम है और अज्ञानी को कठिन। जैसे चाण्डाल के लिए पृथ्वी का राजा होना और तृण के लिए सुमेरु होना कठिन है, वैसे ही अज्ञानी के लिए चित्त का रोकना कठिन है। राजा ने पूछा, हे देवपुत्र! पर्वत तोड़ना कठिन है तो भी वह टूट जाता है; परन्तु मन का रोकना अति कठिन है। जैसे बड़े मच्छ को बालक नहीं रोक सकता, वैसे ही मैं चित्त को नहीं रोक सकता। हे देवपुत्र! तुम कहते हो कि मन का रोकना सुगम है, पर मुझको तो ऐसा कठिन लगता है, जैसे अन्धे पुरुष को लिखी हुई मूर्ति नेत्रों से नहीं देख पड़ती तो वह उसे हाथ में कैसे ले, वैसे ही मन को वश करना मुझे कठिन भामता है। प्रथम चित्त का रूप मुझसे कहिये।

कुम्भज बोले, हे राजन! इस चित्त का रूप वासना है। जब वासना नष्ट होगी, तब चित्त भी नष्ट हो जावेगा। इसमें वासनारूपी बीज को तुम नष्ट करोगे तो चित्तरूपी वृक्ष भी नष्ट हो और न कोई डाल रहे, न कोई फल-फूल हों। यदि डाल को काटोगे तो वृक्ष फिर फिर होगा; क्योंकि डाल के काटने से वृक्ष नष्ट नहीं होता, फिर कई डालें लग जाती हैं। जब बीज को नष्ट करोगे तब वृक्ष भी नष्ट हो जावेगा। राजा बोले, हे भगवन्! चित्तरूपी फूल की यह संसार सुगन्ध है; चित्तरूपी कमल का यह संसार सरोवर है; देहरूपी तृण को उठाने और उड़ानेवाला पवन चित्त है; चित्तरूपी तिल का तेल जरा-मृत्यु और आध्यात्मिक, आधि-भौतिक दुःख हैं; चित्तरूपी आकाश की अँधेरी यह संसार है और हृदय-रूपी कमल का भँवरा चित्त है। बीज क्या है, और डाल क्या है, डाल का काटना क्या है, वृक्ष क्या है और फल-फूल क्या है, सो कृपा कर कहो। कुम्भज बोले, हे राजन! चैतन्यरूपी खेत स्वच्छ और निर्मल है। उसमें अहंभाव बीज है। उर्मी को अहंकार, चित्त, मन, जड़ और मिथ्या