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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1038, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1038

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २२६

कहते हैं। उस अहंकार में जो संवेदन है वही देह और इन्द्रियाँ होकर फैला है और उसमें जो निश्चय है वह बुद्धि है। उस बुद्धि में जो निश्चय है कि 'यह मैं हूँ' वही संसार है और वही जीव का अहंकार है। अहंकार इस वृक्ष का बीज है; चित्तरूपी वृक्ष की डालें और सुख-दुःख इस चित्तरूपी वृक्ष के फल हैं। हे राजन्! एकान्त में बैठकर और चिन्तना से रहित होकर एक आश्रय का त्याग करना और दूसरे को अङ्गीकार करना और इस प्रकार स्थित होना कि मैं ऐसा त्यागी हूँ, इसकी चिन्तना ही उस डाल का काटना है। हे राजन्! इस डाल के काटने से वृक्ष नहीं नष्ट होता; क्योंकि यह तो ऐसा होकर स्थित होता है कि मैं हूँ। होना यह चाहिए कि वासना त्याग करे और कुछ न फुरे। जब अहँरूपी बीज नष्ट हो जाता है, तब जगत्-रूपी वृक्ष भी नष्ट हो जाता है; क्योंकि इसका बीज अहँ ही है। जब अहंभाव बीज नष्ट हुआ, तब वृक्ष भी नष्ट हो जाता है। इससे चित्तरूप बीज को तुम नष्ट करो।

राजा बोले, हे देवपुत्र! तुम्हारा निश्चय मैंने यह जाना है कि जगत् के त्यागने से चित्त को नष्ट करना श्रेष्ठ है। हे भगवन्! इतने काल तक मैं डालें काटता रहा हूँ, इसी से मेरे दुःख नहीं नष्ट हुए। आपने कहा कि अहँ ही दुःखदायी है, इसलिए कृपा करके कहिए कि अहँ कैसे उत्पन्न होता है? कुम्भज बोले, हे राजन्! शुद्ध चैतन्य में जो चैतन्योन्मुखत्व अहँ का स्फुरण हुआ कि 'मैं हूँ,' वही दृश्यरूप हुआ है और मिथ्या संवेदन से हुआ है। जैसे शान्त समुद्र में पवन से लहरें उठती हैं, वैसे ही शुद्ध आत्मा में अहँ फुरता है और उससे संसार हुआ है। इससे अहंभाव नष्ट करो, जिससे शान्तपद में स्थित होओ। जो दुःखदायक वस्तु है, उसको नष्ट करे तो शान्त हो। राजा ने पूछा, हे भगवन्! वह कौन वस्तु है, जो जलाने योग्य है और वह कौन अग्नि है, जिसमें वह जलती है? कुम्भज बोले, हे त्यागियों में श्रेष्ठ राजा! तुम्हारा जो अपना स्वरूप है, उसका विचार करो कि 'मैं क्या हूँ' और 'यह संसार क्या है' इसका दृढ़ विचार करना ही अग्नि है।