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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1039, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1039

२३० * योगवाशिष्ठ *

मिथ्या अनात्मा अर्थात देह-इन्द्रियादिक में अहंभाव को अनात्मस्वरूप विचार-अग्नि में जलाओ। जब विचार-अग्नि में अहंकार-बीज को जलाओगे, तब केवल चिन्मात्र रहेगा। हे राजन्! मेरे उपदेश से तुम अपने को क्या जानते हो, सो मुझसे कहो। राजा ने कहा—मैं राजा, पृथ्वी, पर्वत, आकाश, दशों दिशा, रुधिर, मांस, देह, कर्म-इन्द्रियां, ज्ञान-इन्द्रियां, मन, बुद्धि और अहंकार नहीं; मैं इससे रहित शुद्ध आत्मा हूँ। परन्तु हे भगवन्! अहंरूपी कलङ्क मुझे कहाँ से लगा है कि उस कलङ्क को मैं दूर नहीं कर सकता?

तब कुम्भज ने कहा, हे राजन्! इसी अहं का त्याग करो, जो मैंने त्याग किया है। बल्कि यह फुरना भी न फुरे, नितान्त शून्य हो रहे। जब इसका त्याग करोगे, तब चैतन्य आकाश ही रहेगा। हे राजन्! तुम अपने स्वरूप को जानो कि कौन हो। राजा ने कहा, हे भगवन्! मैं यह जानता हूँ कि मेरा स्वरूप वही आत्मा है, जो सबका आत्मा है; मैं आनन्दरूप हूँ और सब मेरा प्रकाश है। परन्तु मैं यह नहीं जानता कि अहंभाव की कल्पना कहाँ से लगी है? इसका मैं नाश नहीं कर सकता। पर यह मैंने जाना है कि संसार का बीज चित्त ही है और चित्त का बीज अहंकार है। तुम्हारी कृपा से मैंने जाना है कि मेरा स्वरूप आत्मा है और 'अहं,' 'त्वं' मुझमें कोई नहीं। तुम भी इस अहं-रूप कलङ्क को दूर कर रहे हो, पर मुझसे दूर नहीं होता। फिर फिर मन में आता है कि मैं शिखिध्वज हूँ। इस अहं से मैं संसारी हूँ। इसके नाश का उपाय आप कहिए। कुम्भज बोले, हे राजन्! कारण बिना कार्य नहीं होता। जो कारण बिना कार्य भासित हो तो जानिये कि वह भ्रममात्र और मिथ्या है, और जिसका कारण पाइये, उसे जानिये कि सत्य है। इसमें तुम कहो कि इस अहंकार का कारण क्या है, तब मैं उत्तर दूँगा? राजा बोले, हे भगवन्! अहंकार का कारण शुद्ध आत्मा है। शुद्ध आत्मा में जो यह ज्ञान हुआ है कि मैं हूँ, यही उत्थान है। और दृश्य की ओर जो मन लगा है, सो संवेदन ही अहं का कारण है। कुम्भज बोले, हे राजन्! इस जानने का कारण क्या है?