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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1040, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1040

❋ निर्वाण प्रकरण ❋

२३१

प्रथम तुम यह कहो. पीछे दूर करने का उपाय मैं कहूँगा। हे राजन्! जिसका कारण सत् होता है, वह कार्य भी सत् होता है और जो कारण झूठ होता है तो कार्य भी झूठा होता है। जैसे भ्रमदृष्टि में जो दूसरा चन्द्रमा आकाश में दीखता है, उसका कारण भ्रम है। इससे इस भ्रम को ही संवेदन का कारण कहा। सो जानना ही द्रष्टा और दृश्य-रूप होकर स्थित हुआ है।

राजा बोले, हे देवपुत्र! जानने का कारण देहादिक दृश्य है; क्योंकि जानना तब होता है। जब जानने योग्य वस्तु आगे होती है, और जो आगे वस्तु नहीं होती है तो वह जाना भी नहीं जाता। इससे जानने का कारण देहादिक हुए। कुम्भज बोले, हे राजन्! ये देहादिक मिथ्या भ्रम से हुए हैं; इनका कारण तो कोई नहीं। राजा बोले, हे देवपुत्र! देह का कारण तो प्रत्यक्ष है, क्योंकि पिता से इसकी उत्पत्ति हुई है और यह प्रत्यक्ष कार्य करता देख पड़ता है; आप कैसे कहते हैं कि कारण बिना है और मिथ्या है? कुम्भज बोले, हे राजन्! पिता का कारण कौन है? पिता भी मिथ्या है। जैसे स्वप्न में पिता और पुत्र देखिये, वे दोनों मिथ्या हैं। इससे कहो, पिता का कारण क्या है? राजा बोले, हे भगवन्! पुत्र का कारण पिता और पिता का कारण पितामह है। इसी प्रकार परम्परा से सबका कारण ब्रह्मा प्रत्यक्ष है; क्योंकि सबकी उत्पत्ति ब्रह्माजी से हुई है। कुम्भज बोले, हे राजन्! ब्रह्मा से काष्ठ पर्यन्त सब सृष्टि संकल्प की रची है और देह भी भ्रम करके भासित होता है। जैसे मृगतृष्णा का जल और सीपी में रूपा भासित होता है, वैसे ही आत्मा में देह भासित होती है। जैसे आकाश में दो चन्द्रमा भ्रम से दीखते हैं, वैसे ही आत्मा में यह संसार भ्रम से भासित होता है। जो तुम कहो कि क्रिया कैसे दीखती है तो सुनो। जैसे कोई कहे कि बन्ध्या के पुत्र को भूषण पहनाये हैं, तो जब बन्ध्या का पुत्र ही नहीं तो भूषण किसने पहने! अथवा जैसे स्वप्न में सब क्रिया भ्रममात्र होती है; वैसे ही यह संसार तुम्हारे भ्रम में है। जब भ्रम निवृत्त होगा, तब केवल आत्मा ही भासित होगा। हे राजन्! जैसे