योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
❋ निर्वाण प्रकरण ❋
२३१
प्रथम तुम यह कहो. पीछे दूर करने का उपाय मैं कहूँगा। हे राजन्! जिसका कारण सत् होता है, वह कार्य भी सत् होता है और जो कारण झूठ होता है तो कार्य भी झूठा होता है। जैसे भ्रमदृष्टि में जो दूसरा चन्द्रमा आकाश में दीखता है, उसका कारण भ्रम है। इससे इस भ्रम को ही संवेदन का कारण कहा। सो जानना ही द्रष्टा और दृश्य-रूप होकर स्थित हुआ है।
राजा बोले, हे देवपुत्र! जानने का कारण देहादिक दृश्य है; क्योंकि जानना तब होता है। जब जानने योग्य वस्तु आगे होती है, और जो आगे वस्तु नहीं होती है तो वह जाना भी नहीं जाता। इससे जानने का कारण देहादिक हुए। कुम्भज बोले, हे राजन्! ये देहादिक मिथ्या भ्रम से हुए हैं; इनका कारण तो कोई नहीं। राजा बोले, हे देवपुत्र! देह का कारण तो प्रत्यक्ष है, क्योंकि पिता से इसकी उत्पत्ति हुई है और यह प्रत्यक्ष कार्य करता देख पड़ता है; आप कैसे कहते हैं कि कारण बिना है और मिथ्या है? कुम्भज बोले, हे राजन्! पिता का कारण कौन है? पिता भी मिथ्या है। जैसे स्वप्न में पिता और पुत्र देखिये, वे दोनों मिथ्या हैं। इससे कहो, पिता का कारण क्या है? राजा बोले, हे भगवन्! पुत्र का कारण पिता और पिता का कारण पितामह है। इसी प्रकार परम्परा से सबका कारण ब्रह्मा प्रत्यक्ष है; क्योंकि सबकी उत्पत्ति ब्रह्माजी से हुई है। कुम्भज बोले, हे राजन्! ब्रह्मा से काष्ठ पर्यन्त सब सृष्टि संकल्प की रची है और देह भी भ्रम करके भासित होता है। जैसे मृगतृष्णा का जल और सीपी में रूपा भासित होता है, वैसे ही आत्मा में देह भासित होती है। जैसे आकाश में दो चन्द्रमा भ्रम से दीखते हैं, वैसे ही आत्मा में यह संसार भ्रम से भासित होता है। जो तुम कहो कि क्रिया कैसे दीखती है तो सुनो। जैसे कोई कहे कि बन्ध्या के पुत्र को भूषण पहनाये हैं, तो जब बन्ध्या का पुत्र ही नहीं तो भूषण किसने पहने! अथवा जैसे स्वप्न में सब क्रिया भ्रममात्र होती है; वैसे ही यह संसार तुम्हारे भ्रम में है। जब भ्रम निवृत्त होगा, तब केवल आत्मा ही भासित होगा। हे राजन्! जैसे
२३२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
तुम अपना देह जानते हो, वैसे ही ब्रह्मा को भी जानो। ब्रह्मा का कारण कौन है ? इसमें इस भ्रम में जागो, जिसमें तुम्हारा भ्रम नष्ट हो जावे।
राजा बोले, हे भगवन् ! मैं अब जागा हूँ और मेरा भ्रम नष्ट हो गया है। मैंने अब जाना है कि यह संसार केवल संकल्पमात्र मिथ्या है। जो कुछ दृश्य है सो मिथ्या है और एक आत्मा ही मेरे निश्चय में मन है। हे भगवन् ! ब्रह्मा का कारण भी ब्रह्म है और वह अद्वैत अविनाशी और सर्वात्मा है। ब्रह्मा का कारण यह हुआ। कुम्भज बोले, हे राजन् ! कारण और कार्य द्वैत में होते हैं, अतः वे असत् हैं, क्योंकि इस कारण का देश, वस्तु और काल में अन्त हो जाता है, अतः यह परिणामी है। जो वस्तु परिणामी हो, वह मिथ्या है। हे राजन् ! आत्मा अद्वैत है; जिसमें न एक कहना है, न द्वैत कहना है। न वह भोगता है, न भोग है, न कर्म है, न अद्वैत है। जब वह स्वरूप से परिणाम को नहीं प्राप्त होता और सर्वात्मा है, जब सर्व देश और सर्वकाल भी है, जब वह सब वस्तुओं में पूर्ण और अद्वैत है तब यदि वह अद्वैत है तो कारण कार्य किसका हो ? कारण-कार्य का सम्बन्ध द्वैत में होता है और वह परिणामी होता है। जिसमें देशकाल का अन्त है वह अद्वैत आत्मा है। उसमें न कोई देश है, न काल है और न कोई वस्तु है; वह केवल चिन्मात्रपद है।
हे राजन् ! मैं जानता हूँ कि तुम जाग्रत होगे, क्योंकि तुम्हारा भ्रम नष्ट हो जाना है। जैसे बर्फ की पुतली सूर्य की किरणों में गल जाती है, वैसे ही तुम्हारा अज्ञान नष्ट होता जा रहा है। अज्ञान के नष्ट होने पर तुम आत्मा ही होगे। तुम अपने प्रत्यक् चैतन्यस्वरूप में स्थित हो और देखो कि ब्रह्मा आदिक सब परमात्मा का किंचन है। परमात्मा ही इन रूपों में स्थित हुआ है। और जो देख पड़ता है, उस सबका अपना आप आत्मा है। जब जागेगा तो जानेगा, जागे बिना नहीं जान सकता। राजा बोला, हे भगवन् ! तुम्हारी कृपा से अब मैं जागा हूँ और जानता हूँ कि मेरा स्वरूप आत्मा है और में निर्मल हूँ। अब
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २३३
मेरा मुझको नमस्कार है। एक मैं ही हूँ; मुझसे भिन्न कुछ नहीं। मैंने अपने को जाना है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे राजविश्रान्तिवर्णनं नाम चतुःसप्ततितमसर्गः ॥ ७४ ॥
राजा ने पूछा, हे भगवन्! आप कैसे कहते हैं कि ब्रह्मा का कारण कोई नहीं? आत्मा ऐसा अनन्त, अच्युत, अव्यक्त और अद्वैत ईश्वर है वह षट् परिमाणों का विषय नहीं। तब परब्रह्म तो ब्रह्मा का कारण है? कुम्भज बोले, हे राजन्! तुम्हीं कहते हो कि आत्मा अनन्त है। जो अनन्त है, उसको देश, काल और वस्तु का परिच्छेद नहीं होता। जो सब देश, सब काल, और सब वस्तुओं में पूर्ण है, वह कारण-कार्य किसका हो? कारण तब हो, जब पहले द्वैत हो। सो आत्मा अद्वैत है, अतः वह नहीं हो सकता। और कारण उसको कहते हैं, जो कार्य से पूर्व हो और पीछे भी वही हो—जैसे घट के आदि में मृत्तिका है और अन्त में भी मृत्तिका होती है। वह कारण कहलाता है। पर आत्मा में न आदि है, न अन्त है। वह तो अनन्त है। कारण तब होता है, जब परिणाम होता है। सो आत्मा अच्युत है, अपने स्वरूप से कदापि नहीं गिरा। और भोक्ता भी द्वैत से होता। आत्मा अद्वैत है। वह भोग और भोक्ता दोनों नहीं। और आत्मा में कर्म भी नहीं। आत्मा से आदि कौन है जिससे आत्मा सिद्ध हो? वह किसी का कार्य भी नहीं; क्योंकि कार्य इन्द्रियों का विषय होता है। सो आत्मा अव्यक्त है। और जो कार्य होता है तो उसका कारण भी होता है। सो आत्मा सबका आदि है, उसका कारण कौन हो? जो सर्वात्मा है और स्वच्छ आकाशवत् निर्मल है, वही तुम्हारा स्वरूप है। राजा ने पूछा, हे भगवन्! बड़ा आश्चर्य है! मैंने जाना है कि आत्मा अद्वैत है, वह न किसी का कारण है, न कार्य, और अनुभवरूप है। वही मैं हूँ। मैं निर्मल हूँ, विद्या-अविद्या के कार्य से रहित हूँ; निर्वाणपद हूँ और निर्विकल्प हूँ; मुझमें स्फुरण कोई नहीं। और मैं नहीं और मैं ही हूँ। मेरा मुझको नमस्कार है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे पञ्चसप्ततितमसर्गः ॥ ७५ ॥
२३४ ❋ योगवाशिष्ठ ❋
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! राजा शिखिध्वज कुम्भज मुनि के उपदेश में प्रबुद्ध हो और ऐसे वचन कहकर केवल निर्वाणपद में स्थित हुआ। जब निर्विकल्प और स्फुरण से रहित हो एक मुहूर्त्त पर्यन्त स्थित रहा—जैसे वायु से रहित दीपक स्थित होता है—तब कुम्भज ने उसे जगाकर कहा—हे राजन् ! तुम्हें समाधि में क्या है और उत्थान में क्या है तुम तो केवल आत्मा हो। मैं जानता हूँ कि तुम परमज्ञान से शोभित हुए हो। जैसे डिब्बे में रत्न होता है तो उसका प्रकाश बाहर नहीं देख पड़ता और जब डिब्बे से निकालकर देखिये तब बड़ा प्रकाश दीखता है, वैसे ही अविद्यारूपी डिब्बे से तुम निकले हो और परमज्ञान से शोभित हुए हो। हे राजन् ! अब तुममें न कोई क्षोभ है और न कोई उपाधि है। अब तुम संसार के रागद्वेष से रहित, शान्तरूप, जीवन्मुक्त होकर विचारपूर्वक विचरो तो तुम्हें कोई उपाधि न लगेगी।
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार कुम्भज मुनि ने कहा, तब राजा शान्तरूप हो गया और बोला, हे भगवन् ! जो कुछ आपने आज्ञा की है, उसे मैंने भली प्रकार जाना। पर अभी एक प्रश्न है और उसका उत्तर कृपा करके दो कि मैं दृढ़ स्थित होके रहूँ। हे भगवन् ! आत्मा तो एक है और शुद्ध और केवल आकाशरूप चैतन्यमात्र है; उसमें द्रष्टा, दर्शन और दृश्य त्रिपुटी कहाँ से उपजी ? कुम्भज बोले, हे राजन् ! जो कुछ स्थावर-जङ्गम संसार है, वह महाप्रलय पर्यन्त है। जब महाप्रलय होता है, तब केवल आत्मा ही शेष रहता है, जो स्वच्छ और निर्मल है। वहाँ न तेज होता है, न अन्धकार है। वह केवल अपने आप स्वभाव में स्थित होता है। जो कुछ आनन्द है, उसका अधिष्ठान आत्मा है। वह सत् और असत् से रहित है। जिसको बुद्धि 'इदं' करके कहती है, उसे सत् कहिये और जिसको नहीं कहती; उसे असत् कहिये। वह सत् असत् से रहित, सब शुभ लक्षणों से संयुक्त और अपना स्वभाव-मात्र है। उसमें कोई उपाधि नहीं। वह सर्वदा प्रकाशवान और उदय रूप है। यह संसार उस परमात्मा का चमत्कार है। जैसे रत्न का चमत्कार लाट होती है, वैसे ही ब्रह्म का चमत्कार यह संसार है। इससे
✽ निर्वाण प्रकरण ✽ २३५
यह ब्रह्मरूप है । जो ब्रह्मा से भिन्न है, उसे मिथ्याभ्रम ही जानना । जो कुछ आकार भासते हैं, सो असत् है ।
हे राजन् ! जो सब आकार मिथ्या हैं, तो तुम्हारा संवेदन भी मिथ्या है । आत्मा में अहं त्वं का कोई उत्थान नहीं । वह केवल ज्ञानमात्र है, केवल सत् और आनन्दरूप है और अविद्यातम से रहित प्रकाशरूप है । वह प्रमाणों से नहीं जाना जाता, क्योंकि इन्द्रियों का विषय नहीं और मन की चिन्तना से रहित है, क्योंकि सबका द्रष्टा और सबका अपना आप अनुभवरूप है । हे राजन् ! तुम उसी में स्थित हो । आत्मा, बड़े से बड़ा है; सूक्ष्म से सूक्ष्म है और स्थूल से स्थूल है, जिसमें आकाश भी अणु सा है, उसमें ब्रह्माण्ड भी तृण-समान है । वह अपने आपसे पूर्ण है । उससे किंचित् भी उत्पन्न नहीं हुआ और नाना प्रकार करके स्थित हुआ है । स्फुरण से जगत् भासित होता है और स्फुरण के निवृत्त होने पर केवल शुद्ध आत्मा है । राजा ने पूछा, हे भगवन् ! आप कहते हैं कि संसार स्फुरण मात्र है और आत्मा शुद्ध शान्तिरूप और निर्विकल्प है । तो उसमें संवेदन का स्फुरण कहाँ से आया ? कुम्भज बोले, हे राजन् ! स्फुरण भी आत्मा का चमत्कार है । जैसे पवन में स्पन्दन और निःस्पन्द दोनों शक्ति हैं, जब वायु चेतना है, तब चलना प्रकट होता है, और जब ठहर जाता है, तब प्रकट नहीं होता, वैसे ही संवेदन जब चेतना है, तब नाना प्रकार होते हैं और जगत् भासित होता है । और जब वह स्फुरण मिट जाता है, तब केवल शुद्ध आत्मा भासित होता है । हे राजन् ! आत्मा सत्तामात्र है और संसार भी सन्मात्र आत्मा ही है । जो सम्यकदृष्टि से देखिये तो आत्मा ही दीखता है और जो असम्यकदृष्टि से देखिये तो दुःखदायक जगत् दीखता है । जिसके मन में संसारभावना है, उसको वह दुःखदायक लगता है और जिसके हृदय में आत्मभावना होती है, उसको आत्मा ही दीखता है और संसार सुखरूप होता है; क्योंकि आत्मा अपने आपका नाम है । जिसने जगत् को अपना आप जाना है, उसको दुःख कहाँ ?
हे राजन् ! यह संसार भावनामात्र है जैसी भावना होती है, वैसा
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ही यह दीखता है। जिसकी भावना विष में अमृत की होती है, उसे विष भी अमृत हो जाता है और जिसकी भावना अमृत में विष की होती है, उसे अमृत भी विष हो जाता है। अतः संसार भावनामात्र है। मनुष्य जैसी भावना पक्की करता है, चाहे आगे वह वस्तु न हो तो भी उपस्थित हो जाती है अतएव संसार भावनामात्र और मिथ्या है। ज्ञानवान को दुःख कभी नहीं होता और अज्ञानी को सुख कभी नहीं होता। हे राजन् ! अहंता और संवेदन, चित्त और चैत्य, ये भी आत्मा ही की संज्ञा है। जैसे आकाश, शून्य, नभ, ये सब संज्ञा आकाश ही की हैं, वैसे ही ये सब संज्ञा आत्मा की हैं। आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। 'अहं', 'त्वं' सब आत्मा के आश्रित हैं। यद्यपि भूषण सुवर्ण के आश्रित होते हैं, परन्तु सुवर्ण से भूषण तब होता है, जब अपने पूर्व-रूप को त्यागता है। आत्मा वैसा भी नहीं। वह केवल एकरस है और अपने आपमें स्थित है; कभी परिणाम या विकार को नहीं प्राप्त होता। यह संवेदन आत्मा का चमत्कार है और आत्मा सत्-असत् से परे है। जो कुछ दृश्य है, वह आत्मा में नहीं, चित्त ने रचा है, अतएव आत्मा से परे है।
हे राजन् ! वह कारण-कार्य किसका हो ? कारण-कार्य तब होता है, जब दृश्य होता है ? जब आत्मा किसी का विषय नहीं, तब कारण-कार्य किसका हो ? विश्व के आदि में भी आत्मा है, अन्त में भी आत्मा है और मध्य में भी आत्मा ही है। जो कुछ और भासित होता है, वह भ्रममात्र है—जैसे आकाश में जो घर, मण्डल और पुर दीखते हैं, उनका आदि भी आकाश है, अन्त भी आकाश है और मध्य भी आकाश है और वे सब मिथ्या हैं, जैसे अग्नि नाना आकार-प्रकार में देख पड़ती है, और वे सब आकार मिथ्या हैं, एक अग्नि ही है, वैसे ही सबके आदि, मध्य और अन्त में एक आत्मा ही सार है। हे राजन् ! जल में भी देश-काल होता है, क्योंकि वह दृश्य है और इन्द्रियों का विषय है। जैसे यह तरङ्ग अमुक स्थान से उठा और अमुक स्थान में लीन हुआ, यहाँ स्थान देश हुआ और उपजकर इतने काल
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तक रहा, यह काल हुआ। पर जिसको इन्द्रियाँ अपना विषय न कर सकें, उसमें देश-काल कैसे हो? राजा बोले, हे भगवन्! अब मैंने भली प्रकार जान लिया है कि आत्मा चिन्मात्र है तथा ज्ञान-इन्द्रियों और कर्म-इन्द्रियों से परे है। देश, काल और इन्द्रियाँ मन से जानी जाती हैं कि अमुक देश है और अमुक काल है; पर जहाँ इन्द्रियाँ और मन ही न हो, वहाँ देश-काल कहाँ है?
कुम्भज बोले, हे राजन्! जो तुमने ऐसे जाना तो तुम जागे हो। आत्मा में देश, काल कोई नहीं। यह जीव मन और इन्द्रियों से जानता है कि यह देश है और यह काल है। जो इनसे रहित होकर देखे तो आत्मा ही दीखे और जो इन सहित देखे तो संसार ही देख पड़ेगा। हे राजन्! इनसे रहित होकर देखो, तुममें कुछ संसार न रहे कि अमुक प्रश्न किया और अब अमुक प्रश्न करूँ। संसार तब तक होता है, जब तक इनका संयोग अपने साथ होता है। हे राजन्! ब्रह्म से ब्रह्म को देखो और पूर्ण को देखो, जिसमें तुम भी पूर्ण हो। जब तुम पूर्ण होगे, तब सब ओर अपने को ही जानोगे, सब संज्ञा तुम्हारी ही होगी और उस निर्वाच्य पद को प्राप्त होगे, जहाँ इन्द्रियों की गति नहीं है। केवल आकाशरूप है। जैसे आकाश अपनी शून्यता से पूर्ण है, वैसे ही तुम भी अपने चैतन्य स्वभाव में आप पूर्ण होगे। जब तुम मनसहित षट् इन्द्रियों से रहित होकर देखोगे, तब अपने को, फिर यदि इन सहित भी देखोगे तो भी तुम्हें चैतन्य आत्मा ही भासित होगा। संसार का शब्द और अर्थ तुम्हारे हृदय से उठ जावेगा। शब्द अर्थात् संसार है, यह कहना और अर्थ अर्थात् उसकी मत् जानना। केवल आकाशरूप आत्मा ही भासित होगा। संसार संवेदन मात्र है, और संवेदन चित्तशक्ति का चमत्कार है। यही चित्त-शक्ति ब्रह्मा के रूप में स्थित हुई है और संसार को देखने लगी है। जब यह शक्ति अन्तर्मुख होती है, तब आत्मा ही देख पड़ता है, जो सदा एकरस है, और जब बहिर्मुख होती है, तब संसार देख पड़ता है। जीव जैसी भावना करता है, वैसा ही आगे दीखता है। जब
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संसार की भावना होती है तब संसार ही भासता है । और जब आत्मा की भावना होती है तब आत्मा ही भासता है । आत्मा सदा एकरस और असंसारी है, इससे हे राजन् ! तुम आत्मा की भावना करो कि तुम्हें आत्मा ही भासित हो ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे षट्सप्ततितमसर्गः ॥ ७६ ॥
कुम्भज बोले, हे राजन् ! यह संसार जो तुम्हें भासित होता है, सो आत्मा में नहीं है । केवल शुद्ध आत्मा में जो अहं उत्थान है वही संसार है । पर अहं का वह चमत्कार न सत् है, न असत्, न भीतर है, न बाहर; न शून्य है, न अशून्य; केवल अपने आपमें स्थित है । संसार का प्रध्वंसाभाव भी नहीं होता, अर्थात् पहले हो और पीछे नाश हो जावे, ऐसा नहीं होता । आत्मा में संसार उदय-अस्त नहीं होता; केवल अपने आपमें स्थित है, उसमें भिन्न नहीं है । किन्तु आत्मा को यह भी नहीं कह सकते कि केवल अपने आपमें स्वाभाविक स्थित है; उनमें वाणी की गति नहीं है । वाणी उसको कहती है, जहाँ दृगग होता है, पर जहाँ दृगग न हो, वहाँ वाणी क्या कहे । यह कहना भी तुम्हारे उपदेश के निमित्त है; आत्मा में किसी शब्द की प्रवृत्ति नहीं । हे राजन् ! ऐसा आत्मा किसका कारण-कार्य हो ? आत्मा तो शुद्ध, निर्विकार और प्रमाणों से रहित है । जो किसी लक्षण में प्रमाण नहीं किया जाता सो आकार होकर स्थित हुआ है और शान्तरूप है ।
हे राजन् ! ऐसा आत्मा किसका कारण-कार्य हो ? कारण-कार्य तब होता है, जब प्रथम कारण परिणाम और क्षोभ को प्राप्त होता है, पर आत्मा तो शान्तरूप है । और कारण तब हो जब क्रिया से कार्य को उत्पन्न करे । पर आत्मा तो अक्रिय अर्थात् क्रिया से रहित है । कारण को कार्य से जाना जाता है, पर आत्मा चिह्न से रहित है और प्रमाणों का विषय नहीं ? इससे आत्मा किसी का कारण-कार्य नहीं है । आत्मा को कारण-कार्य मानने में मुझे आश्चर्य होता है । हे राजन् ! जो वस्तु उपजती है, वह नष्ट भी होती है, और जो नष्ट होती है वह
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उपजती भी है। पर आत्मा सबका आदि, अजन्मा और निर्विकार है। उसमें तुम स्थित हो जिससे तुम्हारा संसार निवृत्त हो जावे। यह संसार अज्ञान से भासित होता है। जब तुम स्वरूप में स्थित होकर देखोगे तब न भासित होगा; और ऐसे भी न भासित होगा कि आगे था, अब निवृत्त हुआ है। तब तो एकरस आत्मा ही दीखेगा और जीव केवल शून्य आकाश हो जावेगा। संसार से रहित होने को शून्य कहते हैं। चैतन्यस्वरूप नाना होकर भी वही है, और एक भी वही है, शून्य और शून्य से रहित भी वही है; द्वैतरूप भी वही है और अद्वैतरूप भी वही है; ऐसा भासित होगा ।
इति श्रीयो० नि० शिखिध्वजप्रथमप्रबोधननाम सप्तसप्ततितमम्मर्गः ॥ ७७ ॥
कुम्भज बोले, हे राजन् ! जो कुछ तुम देखते हो, सो सब चैतन्य घन है। उसमें 'अहं', 'त्वं' शब्द कोई नहीं। 'अहं', 'त्वं' शब्द प्रमाद से होते हैं। जब आत्मा में स्थित होकर देखोगे तब आत्मा से भिन्न कुछ न दीखेगा। फिर 'अहं', 'त्वं' शब्द कहाँ भासित हों ? हे राजन् ! ये नाना प्रकार की संज्ञाएँ चित्त की कल्पना हैं। जब चित्त से रहित होगे, तब 'नाना' और 'एक', कोई संज्ञा न रहेगी। हे राजन् ! 'सब ब्रह्म' (सर्व खल्विद ब्रह्म) है, यह वाक्य वेद का सार है। जब इस वाक्य में दृढ़ भावना बुद्धि होगी, तब एकरस आत्मा ही दृष्टिगोचर होगा और चित्त नष्ट हो जावेगा। जब चित्त नष्ट हुआ, तब केवल महाशुद्ध आकाश की नाईं स्थित होकर निर्दुःख पद को प्राप्त होगे, जो आदि पद और सर्वदा मुक्तिरूप है। राजा बोले, हे भगवन् ! आपने कहा कि चित्त के नष्ट होने से कोई दुःख न रहेगा और चित्त के नष्ट होने का उपाय भी आपने कहा। परन्तु मैं भली भाँति नहीं समझा। मेरे दृढ़ होने के निमित्त कृपा करके फिर कहिये कि चित्त कैसे नष्ट होता है। कुम्भज बोले, हे राजन् ! यह चित्त न किसी काल का है, न किसी को है, और न यह देखता है। चित्त है ही नहीं तो मैं तुमसे क्या कहूँ और जो चित्त तुमको दृष्ट आता है तो तू आत्मा ही जान, आत्मा से भिन्न कुछ वस्तु नहीं।
२४० ✹ योगवाशिष्ठ ✹
हे राजन् ! महासर्ग के आदि और अन्त में कोई सृष्टि नहीं, केवल आत्मा है, और आत्मा में कुछ नहीं कह सकते । मैंने तुम्हारे जानने के निमित्त ऐसा कहा है । मध्य में जो कुछ दृष्टिगत होता है, वह अज्ञानी की दृष्टि है । आत्मा में कोई सृष्टि नहीं । आत्मा किसी का उपादानकारण या निमित्तकारण भी नहीं है; क्योंकि वह अच्युत है--परिणाम को नहीं प्राप्त होता । उपादान भी परिणाम में होता है । आत्मा शुद्ध, निराकार, आकाशरूप है । तब वह कारण-कार्य किसका हो ? चित्त भी वासनारूप है और वासना तब होती है, जब कोई वस्तु होती है । जब आगे सृष्टि नहीं, तब वासना किसकी जगे और चित्त में संसार की स्थिति कैसे हो ? इससे चित्त कुछ नहीं । यह विश्व आत्मा का चमत्कार है । आत्मा में कोई सृष्टि नहीं है । वह केवल निरालम्ब अपने आपमें स्थित है । हे राजन् ! संसार भी नहीं हुआ और चित्त भी नहीं हुआ, तब 'अहं' आदिक शब्द भी आत्मा में नहीं हो सकते । ये शब्द तब होते हैं, जब चित्त होता है, और चित्त तब तक है, जब तक वासना है । जब निर्वासनिक पद को प्राप्त हुआ तब कोई कल्पना नहीं रहती ।
हे राजन् ! यह संसार महाप्रलय में नष्ट हो जावेगा और मत्-अमत् संसार कुछ न रहेगा । एक आत्मा ही शेष रहेगा, जो निराकार और शुद्ध है । जब तक महाप्रलय नहीं होता, तब तक संसार है । महाप्रलय क्या है, यह भी सुनो । एक क्षण आत्मा का साक्षात्कार होने से सृष्टि का शेष भी न रहेगा । ज्ञान ही महाप्रलय (अत्यन्त प्रलय) है, और अब जो देख पड़ता है, सो मिथ्या है । यह क्रिया भी मिथ्या है और इसका भान होना भी मिथ्या है । जैसे स्वप्न की क्रिया भी मिथ्या है और उसका भान होना भी मिथ्या है, वैसे ही जाग्रत संसार स्वप्नमात्र है, और कारण बिना ही भासित होता है । जो कारण बिना है, वह मिथ्या है । इसका कारण अज्ञान अर्थात् अपना रूप न जानना ही है । जब अपने रूप को जाना, तब अपना रूप आप ही भासित होगा । जैसे स्वप्न में अज्ञान से भिन्न आकार भासित होते हैं, पर जब ज्ञान से
# ❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २४१
जीव जागता है, तब अपना रूप आपही जानता है कि मैं ही था । हे राजन् ! मुझे तो एक आत्मा ही देख पड़ता है, आत्मा से भिन्न संसार नहीं भासित होता । इस संसार की स्थिति मानना मूर्खता है । यह सदा अचलरूप है । वेद, शास्त्र और लोक भी कहता है कि संसार मिथ्या है और मनुष्य आप भी जानता है कि यह नष्ट होता देख पड़ता है । तो फिर उसमें आस्था करना मूर्खता है । आत्मा में संसार नाना विध या एक रूप कुछ नहीं है । आत्मा सर्वदा अपने आपमें स्थित, शुद्ध और अच्युत (ज्यों-का-त्यों) है ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शिखरध्वजबोधनं नामाष्टसप्ततितमस्सर्गः ॥ ७८ ॥
शिखरध्वज बोले, हे भगवन् ! अब मेरा मोह नष्ट हुआ और अपना रूप मैंने जाना । तुम्हारी कृपा से मेरा संसारभ्रम निवृत्त हुआ, और शोकसमुद्र को तरकर अब मैं शान्तपद को प्राप्त हुआ हूँ । 'अहं', 'त्वं' शब्द मुझमें कोई नहीं । अब मैं निर्वाणपद को प्राप्त हुआ हूँ । मैं अच्युत, चिन्मात्र, केवल और शून्य हूँ । कुम्भज बोले, हे राजन् ! आत्मा शुद्ध और आकाश की नाईं निर्मल है; बल्कि आकाश से भी अति निर्मल है । पर उसमें अहं-मल अहंमोह से उपजा है, और मोह अविचार का नाम है । जब विचार होता है, तब कोई अहं नहीं पाया जाता । यह विश्व संवेदन में है और संवेदन सबका आदि है । जब संवेदन अन्तर्मुख होता है, तब सब विश्व लीन हो जाता है । संवेदन ही में बन्धन और मुक्ति है । जब संवेदन बहिर्मुख होता है, तब बन्धन और जब अन्तर्मुख होता है, तब मोक्ष होता है । जिसने मन और इन्द्रियों से रहित होकर अपना रूप आप देखा है; उसको ज्यों का त्यों यथार्थ देख पड़ता है—और जो मोहसंयुक्त देखता है, उसको विपर्यय भासित होता है । जैसे सम्यक् दृष्टि से भूषण में सुवर्ण भासित होता है और जब भूषण के आकार मिट जाते हैं, तब भी सुवर्ण ही दीखता है । पर मूर्ख को सोने में भूषण दीखते हैं । चिरकाल के अभ्यास से जो बुद्धि इनमें जगती है, तो भी प्रारब्ध का वेग जब तक रहता है, तब तक चेष्टा होती
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है। तब चेष्टा में भी आत्मा ही देखता है-इनमें केवल आत्मा ही का किञ्चन होता है। जैसे सोने में सुवर्ण, आकाश में नीलापन और वायु में स्पन्दन है, वैसे ही आत्मा में सृष्टि है। जैसे आकाश में नीलिमा देखने भर को है, वास्तव में कुछ नहीं; वैसे ही आत्मा में सृष्टि वास्तव में कुछ नहीं, भ्रान्तिमात्र है। जब भ्रान्ति निवृत्त होती है, तब जगत् का 'शब्द' और 'अर्थ' सब ओर से शान्त हो जाता है। शब्द-अर्थ की भावना से जो चेष्टा होती है, उससे जब अभिलाषा निवृत्त हो जाती है, तब कोई दुःख नहीं होता। इसी को मुनीश्वर निर्वाण कहते हैं। तब निर्वाणपद का ऐसा निश्चय होता है, तब जीव शान्तरूप शून्यपद में स्थित होता है।
हे राजन् ! अहं का उत्थान होना ही बन्धन है और अहं का निर्वाण होना ही मुक्ति है। अहं के होने से संसार का दुःख है। जब तक अहं का उत्थान है, तब तक संसार है, और जब तक संसार है, तब तक अहं का उत्थान है। जब संसार की सत्ता जाती रहेगी, तब अहं का स्फुरना भी निवृत्त हो जावेगा, और जब जगना नष्ट हुआ, तब अहं भी नष्ट हो जावेगा। जब अहं नष्ट हुआ, तब केवल शुद्ध आत्मा ही शेष रहेगा और उसी का भान होगा। तब असंवैद्य का उत्थान भी शान्त हो जावेगा, और चैतन्यमात्र ही रहेगा। हे राजन् ! जिसको सर्व-ब्रह्म की बुद्धि हुई है, उसको संसार की बुद्धि नहीं रहती, और जिसको संसारबुद्धि है, उसको ब्रह्मबुद्धि नहीं होती। भावना जैसी-जैसी पक्की होती है, वैसा ही वैसा आगे भासित होता है। जिसको ब्रह्मभावना दृढ़ होती है, वह ब्रह्मरूप हो जाता है और जिसको जगत् की भावना दृढ़ होती है, उसको जगत् ही भासित होता है। हे राजन् ! तुम अब जागे हो और ब्रह्मस्वरूप हुए हो, जो शुद्ध, निर्मल और प्रत्यक् है, शब्द और लक्षणों का विषय नहीं, और इन्द्रियों का विषय भी नहीं।
हे राजन् ! ऐसा आत्मा, जो केवल अद्वैत है और विश्व जिसका चमत्कार है, वह कारण-कार्य किसका हो ? जैसे समुद्र में नाना प्रकार के तरङ्ग पवन से उपजते हैं, तो भी वे समुद्र से भिन्न नहीं होते, वैसे ही
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २४३
आत्मा में नाना प्रकार का विश्व संवेदन जगने से उपजता है, तौ भी आत्मा से भिन्न कुछ नहीं है—स्फुरणमात्र है। जैसे खम्भे में मनोराज से कोई पुरुष पुतलियों की कल्पना करता है और नाना प्रकार की चेष्टाएँ करता है, पर उसकी चेष्टा तमीं तक है, जब तक संकल्प है, और जब संकल्प निवृत्त हुआ, तब शून्य खम्भा ही रह जाता है, जैसा आगे था; क्योंकि शिल्पी के संवेदन में सृष्टि थी, वैसे ही यह संसार संकल्पमात्र है। जब संकल्प अन्तर्मुख होता है, तब संसार की सत्ता जाती रहती है। हे राजन् ! संसारसत्ता इस कारण जाती रहती है कि वह पहले ही असत है। जो वस्तु सत् होती है, उसका कभी नाश नहीं होता। इससे संसार केवल संवेदन की कल्पना है। जैसे एक शिला में पुरुष पुतलियाँ बनाता है तौ शिला में तौ पुतली कोई नहीं, ज्यों का त्यों शिला ही है, वैसे ही चित्त के जगने से आकार दीखते हैं। जब चित्त चेतने से रहित होगा, तब आत्मा को अपना रूप आप जानोगे और अशब्दपद को प्राप्त होगे, जो शान्तपद शुद्ध आकाशरूप है। हे राजन् ! सब 'शब्द' और 'अर्थ' का अभावना करना ही ब्रह्मज्ञान है। वहाँ कोई कल्पना नहीं। जब सम्यक्दृष्टि होती है, तब शेष सब आत्मा ही भासित होता है और यह भावना भी उठ जाती है कि यह संसार है और यह ब्रह्म है। तब केवल ज्ञेयमात्र ही रहता है, अर्थात् शिला की तरह जीव अटल-निश्चय होता है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे शिखिध्वजप्रबोधवर्णनं नाम एकानाशीतितमसर्गः ॥ ७६ ॥
राजा बोले, हे भगवन् ! आपका यह कहना सत्य है और मैं भी ऐसा ही जानता हूँ कि संसार आत्मा का कार्य है और आत्मा इसका कारण है। जो आत्मा का कार्य हुआ तो आत्मस्वरूप हुआ, आत्मा से भिन्न नहीं। कुम्भज बोले, हे राजन् ! आत्मा चैतन्यमात्र है, किसी का कारण-कार्य नहीं। आत्मा अप्रत्यक्ष, अक्रिय, अच्युत और नीरस है। तब जो अशब्दपद है, वह कारण-कार्य किसका हो ? कारण को कार्य द्वारा जाना जाता है, पर आत्मा किसी प्रमाण का विषय नहीं,
२४४ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
अप्रत्यक्ष और अरूप है। कारण तब होता है, जब क्रिया होती है। पर वह न किसी का कारण-कार्य है और न कर्म। केवल ज्यों का त्यों अपने आपमें स्थित है और चैतन्यमात्र शिवरूप शुद्ध है। यह विश्व भी चैतन्यमात्र है, जैसे आकाश में आकाश स्थित है, वैसे ही आत्मा में विश्व आत्मरूप स्थित है। ऐसा विश्व चैतन्यमात्र है, पर उसमें असम्यग्दर्शी अज्ञान से नाना प्रकार की कल्पना करता है। वस्तु जो परमात्मा है, उसके प्रमाद में जीव वासनारूप चित्त से विश्व की कल्पना करता है। वह विश्व शब्दमात्र है, अर्थात् कुछ नहीं। जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा, समुद्र में तरङ्ग, मृगतृष्णा में जल और पल्लाही में बेताल भासित होता है, वैसे ही असम्यक्-दर्शी मनुष्य आत्मा में विश्व की कल्पना करता है। और सम्यक्-दर्शी ऐसे जानता है कि आत्मा शुद्ध, अजन्म, अविनाशी और परम निरञ्जन है।
हे राजन् ! जब तुम सम्यकदृष्टि में देखोगे, तब संसार का प्रध्वंसा-भाव भी न देखोगे; क्योंकि विश्व चित्त की कल्पना है और चित्त अज्ञान से उपजा है। स्वरूप में न चित्त है, न अज्ञान है और न संसार है, वह केवल अद्वैतमात्र है। वहाँ 'एक' कहाँ और 'द्वैत' कहाँ, वह तो केवल्य मात्र पद है। जब अज्ञान नष्ट होगा, तब 'अहं', 'त्वं' और चित्त का जगना, सब नष्ट हो जावेगा और फिर भ्रम दृष्टि में न आवेगा। हे राजन् ! आत्मा से भिन्न जो कुछ भासित होता है, वह अज्ञान के कारण और विचार करने में नहीं रहता। राजा बोले, हे भगवन् ! अज्ञान क्या है और कैसे उसका नाश होता है, सो कहिये। कुम्भज बोले, हे राजन् ! एक ज्ञान है और दूसरा अज्ञान। ज्ञान अर्थात् पदार्थ को प्रत्यक्ष जानना और अज्ञान अर्थात् पदार्थों को न जानना। एक ज्ञान भी अज्ञान है, सो भी सुनो। मृगतृष्णा का जल देखकर जल की आस्था करना, या रस्सी में सर्प और सीपी में रूपा देखना और उसको सत्य मानना, यह ज्ञान भी अज्ञान है; क्योंकि देखनेवाला सम्यक्दर्शी होकर नहीं देखता। यह अज्ञान है। एक अज्ञान यह भी है कि शुद्ध
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ २४५
आत्मा निराकार और अच्युत है, उसमें मैं हूँ, और मेरा अमुक वर्णा- श्रम है, और यह विश्व नाना प्रकार का है। यह ज्ञान भी अज्ञान और मूर्खता है। हे राजन् ! न कोई जन्मता है और न कोई मृतक होता है। ज्यों का त्यों आत्मा ही स्थित है। उसमें जन्म-मरण आदिक विकार देखना, यह ज्ञान भी अज्ञान है।
हे राजन् ! जैसे कोई ब्राह्मण हो और ऊँची बाँह करके कहे कि मैं शूद्र हूँ और मुझे वेद का अधिकार नहीं। या जैसे कोई पुरुष कहे कि मैं मृतक हूँ और उसको जानता हूँ, वैसे ही आपको कुछ वर्णाश्रम का अभिमान लेकर कहना मूर्खता है; क्योंकि यह असम्यग्दर्शन है। जब ज्यों का त्यों जानता है, तब दुःखी नहीं होता। हे राजन् ! ऐसा ज्ञान, जो सम्यक्दर्शन से नष्ट हो जावे, सो अज्ञान ही है। जैसे सूर्य की किरणों में जल-बुद्धि होती है और किरण के ज्ञान से जल का ज्ञान नष्ट हो जाता है तो वह जल का जानना अज्ञान ही था, और जैसे रस्सी में सर्प जानना रस्सी के ज्ञान से नष्ट हो जाता है, तो वह सर्प- बुद्धि अज्ञान है, जो सम्यक्दर्शन से नष्ट होता है। जब ऐसे सम्यग्दर्शी होगे, तब आध्यात्मिक तापों से निवृत्त होकर शुद्ध होगे। आत्मा अज, शान्तरूप, सत्-असत् से परे है, उसमें भिन्न वस्तु कुछ नहीं। वह प्रकाश- रूप है। ऐसे तुम हो।
हे राजन् ! अज्ञान भी और कुछ नहीं। इस चित्त के उदय होने का ही नाम अज्ञान है। अज्ञान का कारण चित्त है। जो पदार्थ चित्त में प्रकट हुआ है, नष्ट भी चित्त से ही होता है। इससे तुम शुद्ध चित्त से वासनारूप चित्त का नाश करो। जैसे अग्नि पवन से उपजती है और पवन ही से शान्त होती है, वैसे ही शुद्ध चित्त से चित्त को नष्ट करो। हे राजन् ! न तुम हो, न मैं हूँ, न इन्द्रिय हैं, न संसार है और न यह जगत् है; केवल शुद्ध आत्मा है। हे राजन् ! जो चित्त ही न हो तो चित्त का कार्य विश्व कहाँ हो ? यह अज्ञानी को भासित होता है कि चित्त है और विश्व है। आत्मा केवल अपने आपमें स्थित है। हे राजन् ! चित्त का उदय होना अज्ञान से है। जब अज्ञान नष्ट होता
२९६ * योगवाशिष्ठ *
है, तब चित्त और 'अहं' 'त्वं' सब नष्ट हो जाते हैं। हे राजन् ! तुम शुद्ध आत्मा, एक, प्रकाशरूप, अच्युत और निरन्तर हो। देह इन्द्रिया-दिकरूप में भी तुम ही स्थित हुए हो और इच्छा-अनिच्छा भी तुम ही हो। जैसे चन्द्रमा की किरणें चन्द्रमा से भिन्न नहीं, वैसे ही तुम हो। तुम निर्विकल्प हो। तुममें कुछ स्फूर्ति नहीं। तुम केवल ज्यों का त्यों स्थित हो।
इति श्री वा० निर्वाणप्रकरणे परमार्थोपदेशो नामाशीतितमसर्गः ॥८०॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! जब कुम्भज मुनि ने ऐसे कहा, तब शिखिध्वज शान्ति को प्राप्त हुए और नेत्र मूँदकर सब अङ्गों की चेष्टा से रहित हुए। जैसे शिला पर पुतला लिखा हो, वैसे ही स्थित हो। एक मुहूर्त तक वह निर्विकल्प स्थित रहे और फिर उठे। तब कुम्भज ने कहा— हे राजन् ! आत्मा तो निर्विकल्प है, उस निर्विकल्प शिला में तुमने शयन किया है और ज्ञेय (जानने योग्य) को तुमने जाना है। अब तुम्हारा अज्ञान नष्ट हुआ अथवा नहीं और तुम शान्ति को प्राप्त हुए या नहीं, सो कहो। राजा बोले, हे भगवन् ! तुम्हारी कृपा ने मुझे उसपद को प्राप्त किया है। हे भगवन् ! तत्त्ववेत्ताओं के सङ्ग से जैसा अमृत मिलता है, वैसा क्षीरसमुद्र में भी नहीं मिलता। वह तो देवताओं की सेवा में भी नहीं मिलता। तुम्हारी कृपा से मैंने ऐसे अमृत को पाया है, जिसका आदि-अन्त नहीं और जो अनन्त और अमृतरूप है। अब मेरे सब दुःख नष्ट हो गये हैं और मैं जागा हूँ। अब मैंने अपने आपको जाना है कि मैं आत्मा हूँ; मेरे साथ चित्त कोई नहीं और मैं केवल अपने आपमें स्थित हूँ। अब मुझे कोई इच्छा नहीं। मैंने अपने स्वभाव को पाया है और सबके आदि पद को प्राप्त हुआ हूँ। जिसमें कोई क्षोभ नहीं ऐसे निर्विकल्पपद को में प्राप्त हुआ हूँ। हे भगवन् ! ऐसा मेरा अपना रूप है, जिससे सब प्रकाशित होते हैं। उसके जाने बिना मैंने कोटि जन्म पाये थे। अब मेरे दुःख नष्ट हुए। और तुम्हारी कृपा से मैंने एक क्षण में जान लिया है। आगे भी श्रवण किया था; पर क्या कारण है जो आगे न जाना और अब जाना ?
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २४७
कुम्भज बोले, हे राजन् ! अब तुम्हारे कषाय (मन के मैल) परि-पक्व हुए हैं। जैसे फल परिपक्व होता है, तब यत्न बिना ही वृक्ष से गिर पड़ता है, वैसे ही अब तुम्हारा अन्तःकरण शुद्ध हुआ है और अज्ञान नष्ट हो गया है। जब अन्तःकरण मलीन होता है, तब सन्तों के वचन नहीं लगते और जब अन्तःकरण शुद्ध होता है, तब सन्तों के वचन लगते हैं। जैसे कोमल कमल की जड़ को बाण लगे तो शीघ्र ही वेध जाता है, वैसे ही शुद्ध अन्तःकरण में उपदेश शीघ्र ही प्रवेश करता है। हे राजन् ! अब तुम्हारी भोग-वासना नष्ट हुई है और स्वरूप जानने की इच्छा हुई है; इसमें तुम जागे हो। हे राजन् ! मैंने उपदेश तब किया, जब तुम्हारा अन्तःकरण शुद्ध हुआ है। प्रतिबिम्ब भी वहाँ पड़ता है, जहाँ निर्मल स्थान होता है। जैसे श्वेत वस्त्र पर केशर का रङ्ग शीघ्र ही चढ़ जाता है और रङ्ग भी चटक होता है, वैसे ही शुद्ध अन्तःकरण में सन्तों के वचन शीघ्र ही प्रवेश करते हैं और शोभा पाते हैं। हे राजन् ! जब तक अन्तःकरण मलिन होता है, तब तक चाहे जितना उपदेश कीजिये, स्थिर नहीं होता। जब भोग से वैराग्य होता है, तब कोई वासना नहीं रहती, केवल आत्मपद की इच्छा होती है और तभी स्वरूप का साक्षात्कार होता है। हे राजन् ! अब तुम्हारा सर्वत्याग सिद्ध हुआ और अज्ञान नष्ट हुआ, क्योंकि अब कोई उपाधि नहीं रही। चित्त ही बड़ी उपाधि है। जब चित्त नष्ट हुआ, तब कोई दुःख नहीं रहता। अब तुम सुख से विचरो; तुमको दुःख, शोक और भय कोई नहीं। अब तुम शान्तपद को प्राप्त हुए हो।
राजा ने पूछा, हे भगवन् ! अज्ञानी का चित्त का सम्बन्ध है और ज्ञानवान् को चित्त का सम्बन्ध नहीं होता। जो स्वरूप में स्थित है, वह चित्त बिना जीवन्मुक्तक्रिया में कैसे बरतता है? कुम्भज बोले, हे राजन् ! तुम सच कहते हो कि ज्ञानी को चित्त का सम्बन्ध नहीं होता। जैसे पत्थर की शिला में अंकुर नहीं उपजते, वैसे ही ज्ञानी का चित्त का सम्बन्ध नहीं होता। हे राजन् ! चित्त वासनारूप है और वासना जन्म-मरण का कारण; पर जीवन्मुक्त के वासना नहीं रहती। ज्ञानवान् का
१४८ * योगवाशिष्ठ *
चित्त सत्यपद को प्राप्त होता है और अज्ञानी चित्त में बँधा रहता है; इससे वह जन्मता भी है और मरता भी है। ज्ञानी का चित्त शान्ति में स्थित होने के कारण उसको न बन्धन है, न मोक्ष। वह प्रारब्ध के अनुसार भोग भोगता है और अपने को सर्वात्मा ही देखता है। यद्यपि इन्द्रियों से वह चेष्टा करता है तो भी सर्वत्र ब्रह्म ही देखता है। क्रिया करने में इस अभिमान से रहित होता है कि मैं कर्त्ता और भोक्ता हूँ। अज्ञानी अपने को कर्त्ता मानता है। उसको संसार सत्य भासित होता है, इससे संकल्प-विकल्प करता है। ज्ञानवान् को संसार की सत्यता नहीं भासित होती। वह अपने को अकर्त्ता, अभोक्ता देखता है और अभिलाषा से रहित होकर चेष्टा करता है। जब तक चित्त का सम्बन्ध है, तब तक जीव संसार को सत्य जानकर अपने में क्रिया देखता है, पर जब चित्त ही नष्ट हो गया; तब संसार और वासना का जागना कहाँ रहा?
हे राजन्! अब तुमने चित्त का त्याग किया है, इससे सर्वत्यागी हुए हो। आगे सर्वत्याग न किया था, इससे तुम्हारा अज्ञान न नष्ट हुआ था। अब तुम्हारा अहंभाव दूर हुआ है। जब अज्ञान नष्ट हुआ, तब अहंभाव भी न रहा। अहं का त्याग करने से सर्वत्याग सिद्ध हुआ। पहले तुमने राज्य का त्याग किया था, पर राज्य में तुम्हारा कुछ न था; फिर तन का त्याग किया; फिर वन में आकर सब सामग्री का त्याग किया। पर अब तुमने उसका त्याग किया, जो त्यागने योग्य अहंभाव है—इससे सर्वत्याग हुआ। जो कुछ जानने योग्य है सो अब तुमने जाना है और शान्तपद को प्राप्त हुए हो। हे राजन्! तुम सब दुःखों से रहित आत्मा हो। जैसे मन्दराचल पर्वत से रहित क्षीरसमुद्र शान्तपद को प्राप्त हुआ है, वैसे ही अज्ञान से रहित तुम शान्तपद को प्राप्त हुए हो। अब तुम जागे हो और चित्त का त्याग किया है, इससे अद्वैत सर्वात्मा हुए हो। हे राजन्! जब द्वैत या दो अक्षर होते हैं, तब उनकी संज्ञा नाना प्रकार की होती है—जैसे अमृत-विष; सुख-दुःख और धर्म-अधर्म। पर जो एक ही अक्षर होता है, वह
✹ निर्वाण प्रकरण ✹ २४६
सबका आत्मा है। तैसे ही तुम्हारा द्वैत अज्ञान नष्ट हुआ है और तुम सत्यपद को प्राप्त हुए शुद्ध निर्मल हो।
हे राजन् ! जो ज्ञानवान् है, उसने सम्यकदृष्टि से चित्त का त्याग किया है और उसको कोई दुःख नहीं होता। तू उस पद को प्राप्त हुआ है, जिसमें कोई दुःख नहीं और जहाँ स्वर्गादिक सुख भी तुच्छ हैं; क्योंकि स्वर्ग में भी अतिशय और क्षय होता है। अतिशय इसे कहते हैं कि जो बड़े पुण्यवाले किसी को अपने से ऊँचा देखते हैं तो चाहते हैं कि हम भी इसी के से हो जावें, और क्षय इसे कहते हैं कि ऐसा न हो कि इन सुखों से गिरूँ। निदान स्वर्ग में दोनों प्रकार दुःख होता है। पर तुमने पुण्य-पाप दोनों का त्याग किया है, इससे सर्वत्यागी हो। जो अज्ञानी पापी जीव हैं, उनको स्वर्ग ही भला है। जैसे सुवर्ण का पात्र न पाइये तो पीतल का भी भला, वैसे ही सुवर्ण का पात्र जो ज्ञान है, जब तक प्राप्त न हो तब तक पीतल के पात्र जो स्वर्गादिक हैं, वे नरक से भले हैं। पर तुम जैसे को कुछ नहीं। आत्मा में सब पदार्थों की पूर्णता है। सबकी उत्पत्ति आत्मा से ही है। हे राजन् ! वर्णाश्रम में क्या आस्था करनी है। जहाँ से इनकी उत्पत्ति है, जहाँ ये लीन होते हैं और मध्य में जिसके अज्ञान से देख पड़ते हैं, उसमें स्थित हो।
हे राजन् ! संकल्प-विकल्प जो उठते हैं, उनमें मत स्थित हो; किन्तु जिसमें ये उत्पन्न और लीन होते हैं, उसमें स्थित हो। तपादिक क्रिया से क्या सिद्ध होता है? जिससे तप आदिक सिद्ध होते हैं, उसमें स्थित हो। बूँद में क्या स्थित होना है। जिस मेघ से बूँद उत्पन्न होते हैं, उसमें स्थित होइये। हे राजन् ! जैसे स्त्री भर्ता से कोई पदार्थ चाहे और आप न कहे, वैसे ही तपादिक क्रिया से क्या सिद्ध होता है? जो उनसे आत्मपद को इच्छा करे तो प्राप्त नहीं हो सकता, उसे तो मनुष्य अपने आपमें पाता है। हे राजन् ! आत्मा तुम्हारा अपना आप है, उससे सर्वसिद्धि होता है। जो वस्तु पीछे त्याग करनी हो, उसको ज्ञानवान् प्रथम ही अङ्गीकार नहीं करता। जो कुछ तपादिक हैं, उनको
२५० ❉ योगवाशिष्ठ ❉
चित्त में क्या रचना है ? अपने आपको देखे कि अनुभवरूप है और सर्वदा निरन्तर अपने आपमें स्थित है । जब तुम अपने से आपको देखोगे, तब तपादिक क्रिया को दूर करके शोभा पाओगे । जैसे बादल के दूर होने पर प्रकाशमान चन्द्रमा शोभा पाता है, वैसे ही तुम भी भोग की चपलता को त्यागकर शोभा पाओगे । जब इन्द्रियों को जीतकर किसी पदार्थ में आसक्त न होगे और सर्ववासनाओं का त्याग करोगे, तब ज्ञानवान् होगे । जिसने सर्ववासना का त्याग किया है, उसको विष्णु जानना । वह सर्वराज्य का स्वामी है । जिसने मन जीता है वह चेष्टा में भी ज्यों का त्यों रहता है और समाधि में भी ज्यों का त्यों है । जैसे पवन चलने और ठहरने में तुल्य है, वैसे ही ज्ञानवान् को कहीं खेद नहीं होता । राजा ने पूछा, हे सर्व संशयों के नाशकर्ता ! स्पन्दन और निःस्पन्द में ज्ञानी ज्यों का त्यों कैसे रहता है, सो कृपा करके कहिये ।
कुम्भज बोले, हे राजन् ! चैतन्य आकाश आकाश में भी निर्मल है । जब उसका साक्षात्कार होता है, तब जहाँ देखे वहाँ चैतन्य ही भासित होता है । जैसे समुद्र के जानने में तरङ्ग और बुलबुले सब जल ही दीखते हैं, वैसे ही चित्त बिना आत्मा के देखने में फुरने में भी आत्मा ही दृष्टिगोचर होता है । और जिसने आत्मा को नहीं जाना, उसको नाना प्रकार का जगत ही भासित होता है । जैसे जल को जाने बिना तरङ्ग व बुलबुले भिन्न भिन्न दीखते हैं और जल को जानने में तरङ्ग भी जलमय दीखते हैं । हे राजन् ! सम्यक्दर्शी को जगत आत्मास्वरूप है और असम्यक्दर्शी को जगत है । इसमें तुम सम्यक्-दर्शी होकर देखो कि जगत भी आत्मरूप है, सम्यक्दर्शी जैसे प्राप्त होता है, सो भी श्रवण करो । सम्यक्दर्शन संत के संग और सत-शास्त्र के विचार से प्राप्त होता है । भावना करिये, तब कितने काल में स्वरूप का साक्षात्कार होता है । दृढ विचार के निमित्त काल की अपेक्षा भी कही है । जब दृढ विचार होता है, तब साक्षात्कार होता है और जब स्वरूप का साक्षात्कार होता है, तब स्पन्दन और निःस्पन्द